शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

*श्री रज्जबवाणी पद ~ ४९*

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*साचा सहजैं ले मिलै, शब्द गुरु का ज्ञान ।*
*दादू हमको ले चल्या, जहँ प्रीतम का स्थान ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गौड़ी । (गायन समय २ से ६ दिन में)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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४९ निरंजन पद पद्धति । त्रिताल
गुरु मुख शिष्य गोविंद में जाई,
ऐसे धर्या अधर ह्वै भाई ॥टेक॥
सूर्य सत्ता३ चढै नभ नीर,
त्यों शब्द समाहिं शून्य४ में सीर५ ॥१॥
दीप ज्योति मिल तेल अकाश,
त्यों वचन प्रसंग६ निरंतर बास ॥२॥
धोम गगन मति७ मारुत माग,
त्यों जीव सीव८ ह्वै उनमनि९ लाग ॥३॥
शब्द सुरति सँग आतम थान,
त्यों प्राण ज्ञान गलि पद निर्बान ॥४॥
यूं अंजन१० पलटि निरंजन होई,
रज्जब दास वायु संग जोई ॥५॥२॥
निरंजन पद प्राप्त होने की रीति बता रहे हैं -
✦ गुरु मुख अर्थात गुरु के उपदेश को मानने वाला शिष्य गोविंद के स्वरूप में जाता है, अर्थात गोविंद रूप ही हो जाता है । हे भाई ! इस प्रकार मायिक१ संसार का जीव ब्रह्म२ हो जाता है,
✦ जैसे सूर्य की किरण रूप शक्ति३ से जल आकाश में चढ़ जाता है, वैसे ही ज्ञान मय शब्द में समाकर वृत्ति ब्रह्म४ में मिल५ जाती है ।
✦ जैसे दीप की ज्योति मिल कर तेल आकाश रूप हो जाता है, वैसे ही संत वचनों के सम्बन्ध६ से ब्रह्म में वृत्ति का निरंतर निवास होने लगता है ।
✦ जैसे वायु के मार्ग अर्थात वायु के संग धुआँ आकाश को जाता है, वैसे ही ज्ञान७-मार्ग द्वारा सहज समाधि९ में लगकर जीव ब्रह्म८ हो जाता है ।
✦ जैसे आत्म बोधक शब्द के संग से वृत्ति को आत्म रूप स्थान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही ज्ञान द्वारा प्राणी का जीवत्व भाव गल कर निर्वाण पद प्राप्त होता है ।
✦ देखो जैसे वायु के संग से गंध वायु रूप हो जाता है वैसे ही निरंजन के विचार रूप संग से माया१० में फँसा हुआ जीव भी जीवंत भाव से बदल कर निरंजन पद को प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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