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*शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।*
*काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नारायणदासजी मिश्र लाहौरी*
*छप्पय~*
*भाव सहित भागवत कों, नराणदास नीके कह्यो ।*
*नवला-कुल सु प्रसिद्ध, मिश्र संज्ञा सत पाई।*
*श्रुति स्मृति इतिहास, ग्रंथ आगम विधि गाई ॥*
*वक्ता नारद व्यास, वृहसपति शुक सनकादिक ।*
*इन सम है सर्वज्ञ, सोत ज्यूं चलै गंगादिक ॥*
*संत समागम होत नित, प्रेम-पुंज राघव लह्यो ।*
*भाव सहित भागवत कों, नराणदास नीके कह्यो ॥२३४॥*
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नवलराम मिश्र के कुल में नारायणदासजी मिश्र अतिप्रसिद्ध हुये हैं। इनसे इस कुल की भी प्रसिद्धि हुई है। आपने मिश्र संज्ञा भी यथार्थ ही प्राप्त की है।
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कारण राधा-कृष्ण की मिश्रित भक्ति धर्म का प्रचार किया है। आपने श्रुति, स्मृति, इतिहास और शास्त्रों का गायन विधिपूर्वक किया है।
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आप-नारद, व्यास, वृहस्पति, शुकदेव और सनकादि के समान ही सर्वज्ञ और भागवत धर्म के वक्ता थे।
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प्रवचन के समय इनकी वाणी का प्रवाह सदा चलने वाली गंगादिक नदियों के समान निरंतर चलता था।
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इनके यहाँ नित्य सत्य समागम होता था। इनने अच्छी प्रकार से प्रभु प्रेम की राशि प्राप्त की थी और भाव सहित अच्छी प्रकार श्रीमद्भागवत का प्रवचन करते थे।
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आपको श्रीशुकदेव जी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर श्रीमद्भागवत समझाने का आशीर्वाद दिया था। शुकदेवजी का दर्शन बद्रिकाश्रम में हुआ था ॥२३४॥
(क्रमशः)

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