🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२२९)*
===============
*२२९. जीव-उपदेश । भंग ताल*
*निरंजन जोगी जान ले चेला, सकल वियापी रहै अकेला ॥टेक॥*
*खपर न झोली डंड अधारी, मढ़ी न माया लेहु विचारी ॥१॥*
*सींगी मुद्रा विभूति न कंथा, जटा जाप आसन नहिं पंथा ॥२॥*
*तीरथ व्रत न वनखंड वासा, मांग न खाइ नहीं जग आसा ॥३॥*
*अमर गुरु अविनाशी जोगी, दादू चेला महारस भोगी ॥४॥*
.
भा०दी०-त्वं योगीश्वरं परमात्मानं स्वाभेदेन स्मर । स च योगी सर्वव्यापकोऽपि सर्वसङ्गरहितोऽद्वैतरूपोऽस्ति । विलक्षणोऽयं योगी, न च तस्यभिक्षापात्रम् न च भिक्षाऽऽदानक्षौमम्, न च हस्तदण्डः, न च शरीराधारकं यष्टिवर्तते । किञ्चासावनिकेत: । श्रृङ्गीमुद्रादिकं किमपि मायिक प्रपञ्च न बिभर्ति । न च भस्माङ्गशरीरः । न च कन्थाकौपीनादिकं दधाति । न च जटी न च जपादिकं करोति, स आसनविहीनोऽस्ति न च तीर्थाटनं व्रतञ्चाचरति । न च वनेवासः, न च भिक्षा याचते । नहि भोजनाच्छादनाय जगत्याशास्ते । गुरुजना ब्रह्मीभूतस्य योगिनो लक्षण मेतादृशं व्यपदिशन्ति । कोऽपि शिष्यस्तादृशं योगिनं विजानीयात्तर्हि स ब्रह्मानन्दरसं पीत्वा ब्रह्मरूपो भवेत् ।
उक्तं जीवन्मुक्त विवेके-
अजमजरमनाद्यनेकमेकं पदममलं सकलं च निष्कलञ्च स्थित इति स तदा नभःस्वरूपादपि विमलस्थितिरीश्वरः क्षणेन मुक्तदृशा तु नभःस्वरूपादपि निर्मलस्थिति: सन् अजमनाद्येकममलं पदं भूत्वा स्थितः । वद्धदशातु क्षणेनेश्वरः सन् स्वकार्यभेदैरनेकं सकलं च भूत्वास्थित: इत्यर्थः ।
.
हे जीव ! तू निरंजन निराकार योगियों के भी ईश्वर उस परमात्मा को निजरूप समझ कर उपासना कर । वह योगी रूप परमात्मा सर्वव्यापक होते हुए भी सर्वसंग से रहित अद्वैत रूप है । यह योगी विलक्षण हैं । उसके पास कोई भिक्षा पात्र नहीं, न भिक्षा लानी वाली झोली भी नहीं । हाथ में दण्ड शरीर को समस्थिति रखने के लिये कूकडी या आसा भी नहीं है और न कुटिया है न गले में श्रृंगी धारण करता ।
.
न कानों में मुद्रा है न शरीर में भस्म लगाता । कन्या कौपीन नहीं रखता न तीर्थों में भ्रमण व्रत आदि करता न जटाधारण करता न जपतप आदि साधन करता । न वन में निवास करता । न किसी से भी भोजन यांचा ही करता, न किसी भी जगत् के प्राणियों से भोजन की आशा ही रखता । गुरुजन ब्रह्मस्वरूप योगी के ऐसे ही लक्षण बतलाते हैं । कोई भी शिष्य ऐसे योगी को यदि जान जाय तो वह भी ब्रह्म स्वरूप होकर ब्रह्मानन्द का उपभोग करता रहता है ।
.
जीवनमुक्तविवेक में कहा है कि –
जो अपने को तथा दूसरों को ज्ञान के द्वारा सन्मात्र ब्रह्म स्वरूप समझता है, वह सब भूतों में सन्मात्र रूप से रहने के कारण हरिस्वरूप ही हैं । उसको मैं नमस्कार करता हूँ । जो अपने को अनुभव से तथा वेदान्त वाक्यों से ब्रह्म रूप मानता है वह वर्णाश्रम धर्म से रहित ब्रह्मरूप उत्तम गुरु होता है ।
.
जो योगी अपने अज अजर अनादि एक अमल निकिंचन पद में स्थित है । वह ज्ञानियों की दृष्टि में आकाश से भी निर्मल है । अज्ञानियों की दृष्टि में क्षण भर में ही ईश्वर के समान अपना पराया अनेक प्रकार से कार्य करता रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें