रविवार, 7 अगस्त 2022

*श्रीरामकृष्ण की सत्त्वगुण की अवस्था*

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*दादू माया सौं मन बिगड़या,*
*ज्यों कांजी करि दुग्ध ।*
*है कोई संसार में, मन करि देवे शुद्ध ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण की सत्त्वगुण की अवस्था*
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श्रीरामकृष्ण - यह तो बहुत ही अच्छा है, परन्तु इतनी गालियाँ क्यों दिया करता है ? मेरी वह अवस्था नहीं है । जब बिजली गिरती है, तब भारी चीजें उतनी नहीं हिलती, परन्तु झरोखे की झंझरियाँ हिल जाती है । मेरी वह अवस्था नहीं है । सतोगुण की अवस्था में शोर-गुल नहीं सहा जाता । हृदय इसीलिए चला गया, - माँ ने उसे नहीं रखा । पिछले दिनों में बड़ी बढ़ा-चढ़ी करने लगा था । मुझे गालियाँ देता था, हल्ला मचाता था ।
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"गिरीश घोष जो कुछ कहता है, वह तेरे साथ कहीं कुछ मिला भी ?"
नरेन्द्र - मैंने कुछ कहा नहीं, वे ही कहा करते हैं उनका विश्वास है कि आप अवतार हैं । मैंने कुछ कहा नहीं ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु खूब विश्वास है, देखा है न ?
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भक्तगण एकदृष्टि से देख रहे हैं । श्रीरामकृष्ण नीचे ही चटाई पर बैठे हैं । पास मास्टर है, सामने नरेन्द्र, चारों ओर भक्तमण्डली ।
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप रहकर प्रेमपूर्ण दृष्टि से नरेन्द्र को देख रहे हैं ।
कुछ देर बाद नरेन्द्र से कहा, "भैया, कामिनी और कांचन के बिना छूटे कुछ न होगा ।" कहते ही कहते श्रीरामकृष्ण भावमग्न हो गये ।
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करुणा से भरी हुई सस्नेह दृष्टि है । साथ ही भाव में मस्त होकर गाने लगे –
(भावार्थ) - "बात करते हुए भी मुझे भय होता है, और कुछ नहीं बोलता तो भी भय होता है । मेरे हृदय में यह सन्देह है कि कहीं तुम्हारे जैसे धन को मैं खो न बैठूँ । हम जो मन्त्र जानते हैं, वही मंत्र तुझे देंगे । फिर तो तेरा मन तेरे पास है ही । हम लोग जिस मन्त्र के बल से विपत्तियों से त्राण पाते हैं, उसी मन्त्र से दूसरों को भी उत्तीर्ण कर देते हैं ।"
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श्रीरामकृष्ण को जैसे भय हो रहा हो कि नरेन्द्र किसी दूसरे का हो गया । नरेन्द्र आँखों में आँसू भरे हुए देख रहे हैं ।
बाहर के एक भक्त श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए आये हुए थे । वे भी पास बैठे हुए सब कुछ देख-सुन रहे थे ।
भक्त - महाराज, कामिनी और कांचन का अगर त्याग ही करना है तो गृहस्थ फिर कहाँ जाय ?
श्रीरामकृष्ण - तुम गृहस्थी करो न ! हम लोगों के बीच में एक ऐसी ही बात हो गयी ।
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महिमाचरण चुपचाप बैठे हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण (महिमा से) - बढ़ जाओ, और भी आगे बढ़ जाओ । चन्दन की लकड़ी मिलेगी; और भी आगे बढ़ जाओ, चाँदी की खान मिलेगी; और भी आगे बढ़ जाओ, सोने की खान पाओगे; और भी आगे बढ़ो तो हीरे और मणि मिलेंगे; बढ़े जाओ ।
महिमा – पर जी खींचता रहता है, आगे बढ़ने देता ही नहीं ।
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श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – क्यों लगाम काट दी । उनके नाम के प्रभाव से काट डालो । उनके नाम के प्रभाव से कालपाश भी छिन्न हो जाता है ।
पिता के निधन के बाद से संसार में नरेन्द्र को बड़ा कष्ट हो रहा है । उन पर कई आफतें गुजर चुकीं । बीच-बीच में श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को देख रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "तू चिकित्सक तो नहीं बना ?
-"शतमारी भवेद्वैद्यः सहस्रमारी चिकित्सकः ।" (सब हँसते हैं ।)
श्रीरामकृष्ण का शायद यह अर्थ है कि नरेन्द्र इतनी ही उम्र में बहुत-कुछ देख चुका - सुख और दुःख के साथ उसका बहुत परिचय हो चुका ।
नरेन्द्र जरा मुस्कराकर रह गये ।
(क्रमशः)

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