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*ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।*
*दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३९१)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*श्रीवल्लभाचार्य*
*छप्पय*
*प्रण रु प्रतिज्ञा को भले राघव पुरवै१ राम रिधि ॥*
*वल्लभ गुसांइ हरि वल्लभ, ताहि हरि गोकुल आप्यो२ ।*
*सदा नाथ रछपाल, आप अपणौं करि थाप्यो ॥*
*ता सुत विठलेश्वर सु, भली विधि भक्ति जु साही३ ।*
*अपने मत मजबूत, थप्यौ हरि पैज४ निबाही ॥*
*तासु पछोपै सुत सरस, गिरधर गोकुलनाथ निधि।*
*प्रण रु प्रतिज्ञा को भले, राघव पुरवै राम रिधि ॥२३६॥*
जो भगवद्भक्ति करने में दृढ़ निश्चय वाले होते हैं और अपनी प्रतिज्ञा का भली प्रकार निर्वाह करते हैं उनको रामजी संपत्ति देते१ ही हैं।
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वल्लभ गुसांई(वल्लभाचार्य) जी हरि के प्यारे भक्त थे। उनको हरि ने गोकुल में सब कुछ दिया२ था और श्रीनाथ जी सदा उनके रक्षक बने रहे थे। स्वयं भगवान् ने उनको अपना करके माना था।
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बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथजी ने भी भली प्रकार भक्ति साधी३ थी अर्थात् भक्ति की साधना की थी और अपने मत को दृढ़ रूप से स्थापना की थी तथा हरि-उपासना की प्रतिज्ञा४ का पूर्ण रूप से निर्वाह किया था।
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उनके पीछे उनके पुत्र गिरधर जी और गोकुलनाथ जी बड़े ही सरस और भक्ति की निधि रूप ही हुए हैं।
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वि० सं० १५३५ में दक्षिण भारत से एक तैलंग ब्राह्मण लक्ष्मण भट्ट तीर्थयात्रा करने के लिये उत्तर भारत में आये थे। वैशाख मास था, वे अपनी पत्नी इल्लम्मागारु के सहित काशी में थे। अचानक सुना गया कि काशी पर यवनों का आक्रमण होने वाला है। अतः ये दक्षिण की ओर चल पड़े। मार्ग में चम्पारण्य नामक वन में इल्लम्मा के गर्भ से वल्लभाचार्य का जन्म हुआ था। वहाँ से फिर वे काशी लौट आये और हनुमानघाट पर रहने लगे। अट्ठाईस वर्ष की अवस्था में वल्लभाचार्य जी का महालक्ष्मी के साथ विवाह हुआ। उस समय प्रयाग के सन्निकट यमुना के दूसरे तट पर अडैल में रहा करते थे। इनका अधिकांश जीवन तो व्रज में ही व्यतीत हुआ है।
(क्रमशः)
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