शनिवार, 6 अगस्त 2022

*२५. सबद कौ अंग ~ ५/८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२५. सबद कौ अंग ~ ५/८*
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सबद धणीं५ का धणीं कहै, धणीं कहावै आप ।
जगजीवन बोलै धणीं, पूत पिछांणैं बाप ॥५॥
{५. धणीं-स्वामी=मालिक(परमात्मा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु का नाम लेते हैं वे स्वयं प्रभु ही हो जाते है । जैसे ध्रुव जी नाम जपते स्वयं ध्रुव भगवान होगये । वाणी से ही पुत्र अपने परमात्मा पिता को जीव ब्रह्म को पहचान जाता है ।
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अैसा सबद न आया कोई, लागत खेवट कंत न होई ।
आपै आप पिछांणै सोई, जगजीवन मेल्है सब जोई ॥६॥
संतजगजीवन जी नाम स्मरण की महिमा बताते हुये कह रहे हैं कि ऐसा कोइ शब्द नहीं है जिसके निरंतर स्मरण से सेवक स्वामी न हो सके हो । जो स्वयं के अतंर को पहचानते हैं वे ही सर्वत्र प्रभु आश्रय लेते हैं ।
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सबद साखि वांणी वचन, रांम मिलै रस होइ ।
कहि जगजीवन सोइ गहि, ऊथिपि१ सकै न कोइ ॥७॥
{१. ऊथिपि-उत्क्षिप्त(नष्ट) नहीं कर सकता}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चाहे कोइ शब्द, साखी, वाणी, वचन कुछ भी हो यदि उसमे राम शब्द नहीं है तो वह रस विहीन है रस तो राम शब्द में ही है । जो इसे ग्रहण करता है फिर उसे कोइ नष्ट नहीं कर पाता है ।
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भाषी भाषै भरमी नर, बोली बोलै बाणि ।
कहि जगजीवन कही कहै, अनहद गहै न जांणि ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव भ्रम वश कितने ही प्रकार के शब्द रटता है, बोली बोलता है वह पूर्व में कही गयी बात ही कहता है, वह नाद शब्द जो अनहद को नहीं पहचानता है ।
(क्रमशः)

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