रविवार, 7 अगस्त 2022

शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३०

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३०)*
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*२३०. उपदेश । भंग ताल*
*जोगिया बैरागी बाबा, रहै अकेला उनमनि लागा ॥टेक॥*
*आतम जोगी धीरज कंथा, निश्‍चल आसण आगम पंथा ॥१॥*
*सहजैं मुद्रा अलख अधारी, अनहद सींगी रहणि हमारी ॥२॥*
*काया वन-खंड पांचों चेला, ज्ञान गुफा में रहै अकेला ॥३॥*
*दादू दर्शन कारण जागे, निरंजन नगरी भिक्षा मांगे ॥४॥*
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भा०दी०-ममाऽयमात्मा विशुद्धब्रह्मध्यानाभ्यासवशीकृतत्वेन मलिनवासनानाशादुत्पन्न विवेकवैराग्यवान् योगी जात: । एकाकी वसनन्नुम्मनीभावं प्राप्तश्च । अयं ममात्माधैर्यकन्थोनिश्चल ब्रह्मणि स्थितत्वात् तस्य तदेवासनम् । वाड्मनसाऽप्यगोचरस्य ब्रह्मणो विचार एव तत्प्राप्तिमार्गः । निर्द्वन्द्वतारूपामुद्रा । यन्मनसा न मनुते यद् वाचाऽनभ्युदितं तदेव ब्रह्म सर्वाधारो ममाधारञ्चास्ति अनाहतनाद एव वादनक्षम वाद्यवत् श्रृङ्गी, सत्याचरणमेव धारणा मे । निगृहीतान्येव पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि कायानगर आज्ञाकारीणि शिष्यवच्छिष्या भवन्ति । जीवब्रह्मणोरैक्यज्ञानमेव गह्ररम् । तत्र स्वयमेव जीवात्मा निवसति । स च जीवात्मा ब्रह्मज्ञानार्थमुबुद्धो वर्तते । कायानगरे साक्षात्काररूपां भिक्षा याचते सिद्धे चासने शीतोष्णसुखदुःखमानापमानादिद्वन्दै यथापूर्वं नाभिहन्ति । ननु संप्रज्ञातसमाधावैकाग्यचितवृत्ते दर्शनहेतुत्वेऽपि असंप्रज्ञातसमाधिमापन्नस्य चितस्य शान्तात्मन्यवरुद्धवृत्तित्वेन सुषुप्तवन दर्शनहेतुत्वं संभवतीतिकथं साक्षात्काररूपाभिक्षायाचना संभवेदिचेन्न । स्वत: सिद्धदर्शनस्य निवारयितुमशक्यत्वात् । यथा घट उत्पद्यमानः स्वतो वियत्पूर्ण एवोत्पद्यते जलतण्डुलादिना पूर्णन्तूत्पन्ने घटे पश्चात्पुरुषप्रयत्नेन भवति । तथा तत्र जलादौनि: सरितेऽपि न नभो निवारयितुं शक्यते । मुखेपिहितेऽपिघटाभ्यन्तरे नभोऽवतिष्ठत एव । एवं चिते भूषानिधिक्तद्रुततामवत्तस्यघटपटरूपरससुखदुःखादिवृत्तिरूपत्वं भोगहेतुर्धर्माधर्मादिवशाद् भवति । तत्ररूपरसाधनात्माकारेनि: सारितेऽपि अनिमित्तनित्यचिदाकारो न निवारयितुं शक्यते । अतो निरोय माधिना निर्वृत्तिकेन संस्कारमात्रशेषतया सूक्ष्मत्वेन तस्य चित्तस्य चिदात्यमात्राभिमुरद्धन्वाटैकाग्रेण धियो धर्मादि हेतुतः रहा चित्तेन निर्विघ्नमात्मानुभूयते ।
उक्तं हि वार्तिकारैः~
सुखदुःखादिरूपत्वं निर्हेतुस्त्वात्मसम्बन्धरूपत्वं वस्तुवृत्तितः ॥ (वृत्तः) इति पाठान्तरं । प्रशान्तवृत्तिकं चितं परमानन्ददीपकम् असंप्रज्ञातनामाऽयं समाधिोगिनां प्रियः॥ एतदभिप्रायेणैवाचार्येण श्रीदादूनाप्युक्तं “दादूदरसन कारण जागे निरञ्जन नगरी भिक्षा मांगे ।"
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हे तात ! मेरा जीवात्मा विशुद्ध ब्रह्म का ध्यान करते करते मलिन वासना को त्याग कर विवेक वैराग्य संपन्न योगी हो गया है और अब अकेला रहकर उन्मनी भाव को प्राप्त हो गया है और जैसे योगी कंथा आदि धारण करते हैं वैसे ही मैं धैर्यरूपी कंथा को धारण कर रहा हूँ । क्योंकि योग में धैर्य की बडी आवश्यकता होती है ।
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अन्यथा साधक घबडा जाता है और धैर्य धारण करके निश्चल ब्रह्म में अहर्निश स्थित रहता है । अतः उसका यही आसन है । वाणी मन से जो अगम्य ब्रह्म है उसकी प्राप्ति का मार्ग जो आत्मा-अनात्मा का विचार है सो उसका ही विचार करता रहता है । सदा निर्द्वन्द्व रहना ही उसकी मुद्रा धारण करना समझो । मन वाणी का अविषय ब्रह्म जो सर्वाधार है, वह ही मेरा आधार । कूकडी या आसा है ।
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अनाहत नाद ही नित्य वजने वाली श्रृंगी है । सत्य ब्रह्म को धारण करना ही ध्यान धारणा है । निगृहीत पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ ही आज्ञाकारी शिष्य की तरह मेरे वश में रहती है । जीव ब्रह्म की एकता का ज्ञान ही गुफा है, उसमें मेरा जीवात्मा सदा बैठा रहता है । ब्रह्म प्राप्ति के लिये सदा जागता रहता है । इसी शरीर में निर्विकल्प समाधि में दर्शन की भिक्षा मांगता है ।
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यहां पर कोई शंका करता है कि –
संप्रज्ञात समाधि में चित्त की वृत्ति के एकाग्र होने से आत्मा का दर्शन एकाग्र चित्त से हो सकता है । परन्तु असंप्रज्ञात समाधि में तो चित्त ज्ञान आत्मा में अवरुद्ध हो जाता है । अतः वृत्ति का अभाव होने से सुषुप्त की तरह चित्त रहता है उस चित्त में ब्रह्म दर्शन रूप भिक्षा की याचना कैसे बन सकती है?
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इसका समाधान है कि –आत्मा का साक्षात्कार स्वतः सिद्ध है । उसको रोका नहीं जा सकता, जैसे घडा आकाश से अन्वित ही पैदा होता है । उत्पन्न होने के पश्चात् पुरुष प्रयत्न से उसमें जल चांवल आदि पदार्थ भरे जाते हैं । तथा उनके निकाल लेने पर भी उसमें जो आकाश है उसको नहीं निकाल सकते हैं । ऐसे ही चित्त आत्मचैतन्य से परिपूर्ण ही पैदा होता है ।
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चित्त के उत्पन्न होने के बाद में जैसे तपाया हुआ ताम्बा किसी पात्र में डाल देने पर उस तांबे का आकार पात्र में समनाकार हो जाता है । जैसे ही धर्माधर्म के कारण चित्त भी घट पट सुख दुःख के आकर से परिणित हो जाता है । जो भोग के हेतु हैं । चित्त में से भोग के हेतु हैं, उन सुख दुख घट पट रस रूप को हटा देने पर भी अनिमित जो चित्त का आकार है उसको नहीं मिटा सकते हैं । वैसे ही निरोध समाधि के द्वारा चित्त, वृत्ति रहित हो गया है । परन्तु संस्कार मात्र शेष रहने से चित्त चिदात्मा के सन्मुख होने से निग्रहीत चित्त के द्वारा आत्म साक्षात्कार निर्विघ्न वृत्ति के बिना भी बन जायगा ।
(क्रमशः)

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