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*नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण ।*
*दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सुन्दरी का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६)गोपीप्रेम*
गिरीश (श्रीरामकृष्ण से) - महाराज, एकांगी प्रेम क्या चीज है ?
श्रीरामकृष्ण - इसका अर्थ है केवल एक ओर से प्रेम । उदाहरणार्थ, पानी बतक को ढूँढ़ने नहीं जाता वरन् बतक ही पानी को चाहता है । प्रेम और भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे 'साधारण' 'समंजस' और 'समर्थ' ।
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पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है । वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं । इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था ।
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दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं । यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है, परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है । इस 'समर्थ' प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है, 'तुम सुखी रहो, मुझे चाहे कुछ भी हो ।'
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राधा में यह प्रेम विद्यमान था । श्रीकृष्ण के सुख में ही उन्हें सुख था । गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी ।
"जानते हो गोपियाँ कौन थी ? श्रीरामचन्द्रजी उस घने जंगल में घूमते थे जिसमें सात हजार ऋषि रहते थे । वे सब श्रीरामजी को देखने के लिए बड़े उत्सुक थे । उन्होंने उन सब पर एक दिव्य दृष्टि डाल दी । कुछ पुराणों का कथन है कि बाद में वे ही सब ऋषि वृन्दावन में गोपियों के रूप में अवतीर्ण हुए ।"
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एक भक्त - महाराज, अन्तरंग किसे कहते हैं ?
श्रीरामकृष्ण - मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ । एक सभामण्डप में भीतर भी खम्भे होते हैं और बाहर भी । अन्तरंग भीतरवाले खम्भों के सदृश हैं । जो सदैव गुरु के समीप रहते हैं वे अन्तरंग कहलाते हैं ।
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(महिमाचरण से) "ज्ञानी अपने लिए न तो ईश्वर का रूप चाहता है, न अवतार ही । श्रीरामचन्द्रजी जब वन में घूम रहे थे तो उन्होंने कुछ ऋषियों को देखा । ऋषियों ने बड़े स्नेह से उनका अपने आश्रम में स्वागत किया और कहा, 'प्रभो, आज तुम्हारे दर्शन प्राप्त करके हमारा जीवन कृतकृत्य हो गया, पर हम जानते हैं कि तुम दशरथ के पुत्र हो ।
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भरद्वाज तथा अन्य ऋषि तुमको ईश्वरी अवतार कहते हैं, पर हमारा वह दृष्टिकोण नहीं है । हम तो निर्गुण, निराकार सच्चिदानन्द का ध्यान करते हैं ।' श्रीराम यह सुनकर प्रसन्न हुए और मुस्करा दिये ।
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"ओह ! मुझे भी कैसी कैसी मानसिक परिस्थितियों में से होकर गुजरना पड़ा । मेरा मन कभी कभी निराकार परमेश्वर में लीन हो जाता था । कितने ही दिन मैंने इस अवस्था में बिताये । मैने भक्ति और भक्त का भी त्याग कर दिया था । मैं जड़वत् हो गया था । मुझे अपने सिर तक का ध्यान नहीं था । मैं मरणासन्न हो गया था । तब तो मैंने रामलाल की चाची* को अपने पास रखने का सोचा था ।
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मैंने अपने कमरे से सभी चित्रों को हटाने के लिए कह दिया । जब मुझे बाह्य ज्ञान प्राप्त हुआ और जब मेरा मन उस अवस्था से उतरकर साधारण अवस्था पर आ गया तो मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मानो एक डूबते हुए मनुष्य के समान मेरा दम घुट रहा हो ।
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अन्त में मैंने अपने मन में कहा, 'मैं तो लोगों का अपने पास रहना भी नहीं सह सकता हूँ, फिर मैं जीवित कैसे रहूँगा ?" तब मेरा मन एक बार फिर भक्ति और भक्त की ओर झुक गया । मैं लोगों से यही लगातार पूछता था कि मुझे क्या हो गया है ।
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भोलानाथ# ने मुझसे कहा, 'आपकी इस मानसिक स्थिति का वर्णन महाभारत में है ।' समाधि-अवस्था से उतरने के बाद फिर भला मनुष्य कैसे रह सकता है ? निश्चय ही उसे ईश्वर-भक्ति की आवश्यकता होती है तथा ईश्वर-भक्तों का संग । नहीं तो वह अपना मन किस बात में लगायेगा ?" (*श्रीरामकृष्ण की लीलासहधर्मिणी, #दक्षिणेश्वर-मन्दिर के एक मुन्शी ।)
(क्रमशः)

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