शनिवार, 31 दिसंबर 2022

*श्री रज्जबवाणी पद ~ ९७*

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*महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।*
*अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग टोडी । (गायन दिन ६ से १२)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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९७ करुणा विनय । मत्तताल
गुनहगार१ गुनहगार,
लेखा कछु नाहिं, मेरे ऐब२ हैं अपार ॥टेक॥
बहुत मैल बुरे फैल३, बेहद४ बदकार५ ।
अव्वल६ रोग दिल दरोग७, बदी८ बिसियार९ ॥१॥
तर्क१० खैर११ सूम१२ सैर१३, नेकी बंजार१४ ।
बहुत ढील मन बखील१५, पावै क्यों पार ॥२॥
बहु गुमान१६ तज सुभान१७, नाहीं अखत्यार१८ ।
रज्जब रजूल१९ गुफत२०, सूल२१ सांई सतार२२ ॥३॥१४॥
दु:ख से रक्षार्थ विनय कर रहे हैं -
✦ मैं अपराधी हूँ१, अपराधी हूँ, मेरे दोष२ अपार हैं, उनका कुछ भी हिसाब नहीं है ।
✦ मुझमें मैल भरा है, मेरे बुरे नखरे३ हैं, असीम४ कुकर्म५ हैं, मेरे हृदय में एक६ नम्बर का मिथ्या७ राग रुप रोग है, बुराई८ बहुत९ अधिक है,
✦ दान११ का त्याग१० है, कृपणता१२ में घूम१३ रहा हूँ, भलाई से दु:खी१४ होता हूँ मन कृपण१५ है और बहुत शिथिल रहता है, फिर यह संसार का पार कैसे पायेगा ?
✦ मुझमें बहुत अभिमान१६ है मैंने पवित्र१७ प्रभु का चिंतन भी त्याग दिया है । मेरा कोई अधिकार१८ नहीं है, मैं पद दलित१९ हूँ, यह मैंने मेरा दु:ख२१ कहा२० है । प्रभो ! आप क्षमाशील२२ हैं, मेरी रक्षा करें ।
(क्रमशः)

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