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*कबहूँ नांहि न तुम तन चितवत,*
*माया मोह परे ।*
*दादू तुम तज जाइ गुसाँई,*
*विषया मांहि जरे, हो गुसाँई ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २३)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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नारायण के अनुरोध करने पर नरेन्द्र ने फिर गाया ।
(भावार्थ) “ऐ हृदयरमा माँ - प्राणों की पुतली ! आओ, तुम हृदय के आसन पर आसीन हो जाओ, मैं दृष्टि को तृप्त करता हुआ तुम्हें देखूँ । जन्म से ही मैं तुम्हारा मुँह जोह रहा हूँ । ऐ माँ, तुम जानती हो, मैं कितना दुःख भोग चुका हूँ । ऐ आनन्दमयी, एक बार तो हृदय-पद्म को विकसित करके वहाँ अपना प्रकाश दिखा दो ।"
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नरेन्द्र मन ही मन गा रहे हैं –
(भावार्थ) "माँ, तेरा अपरूप रूप घोर अँधेरे में चमक रहा है । इसीलिए गिरि-गुहाओं में योगीजन तुम्हारा ध्यान करते हैं ।"
समाधि का यह संगीत सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये ।
श्रीरामकृष्ण को भावावेश है । उत्तरास्य हो, दीवार के सहारे, पैर लटकाये हुए तकिये पर बैठे हुए हैं । चारों ओर भक्तगण बैठे हैं ।
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भावावेश में श्रीरामकृष्ण माता से बातें कर रहे हैं । कह रहे हैं - "भोजन करके इस समय चला जाऊँगा । तू आयी ? पोटली बाँधकर, जहाँ रहेगी वह घर ठीक करके तू आयी है क्या ?
"अब मुझे कोई नहीं सुहाता ।
"माँ, गाना क्यों सुनूँ ? उससे तो मन कुछ बाहर चला जाता है ।"
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क्रमश: श्रीरामकृष्ण को बाह्य संसार का ज्ञान हो रहा है ।
भक्तों की ओर देखकर उन्होंने कहा, - "हण्डी में पानी भरकर किसी को उसमें मछलियों को रखते हुए देख पहले मुझे बड़ा आश्चर्य होता था । मैं सोचता था, ये लोग बड़े हत्यारे हैं, अन्त में इन मछलियों को मार डालेंगे । अवस्था जब बदलने लगी, तब मैंने देखा, यह शरीर ऊपर का ढक्कन है । न इसके रहने से कुछ बनता-बिगड़ता है, न जाने से ।"
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भवनाथ - तो क्या मनुष्यों की हिंसा की जा सकती है ? हत्या की जा सकती है ?
श्रीरामकृष्ण - हाँ, उस अवस्था में की जा सकती है । वह अवस्था सब की नहीं होती । वह ब्रह्मज्ञान की अवस्था है ।
"दो-एक स्तर उतरने पर भक्ति और भक्त अच्छे लगते हैं ।
“ईश्वर में विद्या और अविद्या दोनों हैं । यह विद्या-माया जीव को ईश्वर की ओर ले जाती है, अविद्या-माया ईश्वर से जीव को दूर बहकाकर ले जाती है ।
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विद्या की क्रीड़ा ज्ञान, भक्ति, दया और वैराग्य हैं । इनका आश्रय लेने पर मनुष्य ईश्वर के पास पहुँच सकता है ।
‘‘एक सीढ़ी और चढ़ने पर ईश्वर मिलते हैं - ब्रह्मज्ञान होता है । इस अवस्था में सच्चा ज्ञान होता है - तब वास्तव में समझ पड़ता है कि मैं ठीक देख रहा हूँ, वे ही सब कुछ हुए हैं । उस समय त्याज्य और ग्राह्य नहीं रहते । किसी पर क्रोध करने की जगह नहीं रहती ।
(क्रमशः)

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