मंगलवार, 17 जनवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १०४*

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*दादू कृत्रिम काल वश, बंध्या गुण मांही ।*
*उपजै विनशै देखतां, यहु कर्त्ता नांही ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग टोडी । (गायन दिन ६ से १२)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०४ कारण कार्य । कहरवा
कारण कारज समझ्या भाई, 
सदगुरु ने आंटी१ समझाई ॥टेक॥
कारण मांटी कारज भांडा, 
ज्ञान गुरु फूटा भ्रम आंडा२ ॥१॥
कारण गिरिवर कारज मूरति, 
ता ऊपरि भूलो श्रुति सुरति३ ॥२॥
कारण कर्त्ता कारज देही४, 
रज्जब भ्रम भान्या५ सु सनेही६ ॥३॥२१॥
कारण कार्य संबंन्धी विचार प्रकट कर रहे हैं -
✦ भाई ! सदगुरु ने कारण कार्य को समझने की युक्ति१ हमें समझा दी थी, उससे हमने कारण कार्य को समझ लिया है ।
✦ कारण मिट्टी है और कार्य उसका बर्तन है किंतु गुरु के ज्ञान से वह कार्य रूप भ्रम का भांड२ फूट गया है अर्थात उसमें मिट्टी ही सत्य है भांड की कल्पना भ्रम रूप है ।
✦ कारण पर्वत है और कार्य मूर्ति है, उस मूर्ति पर जाकर प्राणी की वृत्ति श्रुति के बताये हुये ब्रह्म के स्वरूप३ को भूल गई है ।
✦ कारण सृष्टि कर्त्ता परमात्मा है और कार्य जीवात्मा४ है किंतु जीवात्मा और परमात्मा का भेद रूप भ्रम था सो हमारा तो प्यारे६ गुरुदेव ने भली भांति नष्ट५ कर दिया है ।
(क्रमशः)

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