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*दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम ।*
*सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swa
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*साह रहे युग नारि विवाहत,*
*भक्त इकै हरि देव दिखाओ।*
*आप कहा सत जान गये प्रभु,*
*ल्यो रुपया वह राग दिवाओ ॥*
*देख निहाल भई प्रभु को मुख,*
*जाय जगो रुपया गिनवाओ।*
*दाम लिये रु दिया वह कागज,*
*भोजन देत भई प्रभु पाओ ॥३०३॥*
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जूनागढ़ में एक सेठ रहता था, उसका विवाह दो नारियों से हुआ था। उसकी एक स्त्री हरि भक्त थी। उसने नरसीजी से कई बार प्रार्थना की थी कि - "मुझे भी श्रीहरि का दर्शन करा दीजिये।''
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नरसीजी ने उसे कहा भी था कि बहुत अच्छा। सो प्रभु जान गये थे। फिर आपने भक्त की वाणी सत्य करने के लिए तथा केदार राग छुड़ाने के लिए, नरसीजी के रूप में जाकर पुकारा- लो अपने रुपये और वह राग दो।
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तब बड़भागिनी भक्त स्त्री ने द्वार खोला और प्रभु का मुख देखकर तथा प्रणाम करके निहाल हो गई। फिर वह अपने पति के पास जाकर उसे जगाया और कहा- केदार के रुपये गिना लो और केदार दो, नरसीजी आये हैं। उसका अभागा पति मुख पर वस्त्र डाले सोता ही रहा, उसने दर्शन भी नहीं किये।
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अपनी स्त्री से कह दिया कि रुपये लेकर कागज दे दो। उस स्त्री ने द्रव्य लेकर राग वाला कागज दे दिया, फिर प्रेम से कुछ मेवा मिठाई आदि का भोजन देकर प्रार्थना की कि - प्रभो ! प्रसाद पाइये।
(क्रमशः)

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