गुरुवार, 19 जनवरी 2023

और न कोई रख्या करै

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*बच्चों के माता पिता, दूजा नाहीं कोइ ।*
*दादू निपजै भाव सूं, सतगुरु के घट होइ ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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आप किया की आप हीं करौ । दूजी और न मन मैं धरौ ॥टेक॥
बालिक मरै माइ दुष पावै । अैसी दया थारै कांइ न आवै ॥
सुत भोलौ दौड़ै विष षाइ । माता मारि र१ लेइ छुड़ाइ ॥
और न कोई रख्या करै । डांवांडूल होइ जीव मरै ॥
टीला कै यहु संसौ रहै । दूजौ कौंण तिन्हैं या कहै२ ॥१४॥
(पाठान्तर : १. रु, २. करै)
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परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं, जो स्वयं द्वारा करने योग्य है, उसको स्वयं ही करो । मन में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा विचार मत लाओ ॥टेक॥
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यदि बालक मरता है तो माता को अत्यन्त दुःख होता है । जिस प्रकार की करुणा व दया माता के मन में उमड़ती है वैसी क्यों नहीं, तेरे मन में भी उत्पन्न होती है ।
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भोला पुत्र विष खाने को दौड़ता है किन्तु माँ उसको डरा-धमकाकर, मार-पीटकर उस विष को खाने नहीं देती ।
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माता में अतिरिक्त अन्य कोई भी उसकी रक्षा नहीं करता । अन्य तो डाँवाडोल = संशयग्रस्त हुए = क्या करें, क्या न करें, में ही उलझे रह जाते हैं और जीव का प्राणान्त हो जाता है ।
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टीला के मन में यह संशय है कि दूसरा ऐसा कौन है जिससे वह अपनी आपबीती बात कहे ॥१४॥
(क्रमशः)

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