बुधवार, 18 जनवरी 2023

*२८. काल कौ अंग २५/२८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग २५/२८*
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जगजीवन सौ बरस मैं, षकषर बक्शर बात ।
तरवर सेती बीछुटै, पाक झड़ै ज्यूं पात ॥२५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में आवागमन ही है । सब पके पत्तों से यहां एक दूसरे से बिछड़ते हैं ।
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पात पुराणे झड़ि पड़े, कौंपल१ अल्हरिया२ ।
जगजीवन ते पति खिरे३, जे दीसे हरिया ॥२६॥
(१. कौंपल=नयी हरी पत्ती) (२. अल्हरिया=बचपन की मस्ती से भरी) (३. पति खिरे=वे भी झड़ गये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पुराने पत्ते झड़ पड़े हैं नयी कोंपले आने को उद्यत हैं । संत कहते हैं कि जो हरे भरे दिखते थे वे अब वे झड़ गये हैं ।
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जैसा मोती ओस का, तैसा यहु संसार ।
दीसत दीखै चिलकता, पुनि४ जातन लागै बार ॥२७॥
{४. पुनि=पुनः(फिर)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह संसार ओस के मोती जैसा है दिखता तो चमकता हुआ है पर इसे जाते समय नहीं लगता है । और जाते समय ही नहीं लगता है ।
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जगजीवन जग जात है, ज्यूं अंजलि५ का नीर ।
एक निरंजन नांव बिन, कोइ रहत न देख्या थीर६ ॥२८॥
{५. अंजलि=जुड़े हए हाथ(करसम्पुट)} (६. थीर=स्थिर, अचल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह संसार मुट्ठी के जल जैसा है जो स्थिर नहीं है । एक प्रभु के नाम के बिना कुछ भी स्थिर नहीं है ।
(क्रमशः)

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