शनिवार, 21 जनवरी 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #२८७

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२८७)*
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*२८७. परिचय । कोकिल ताल*
सुन्दर राम राया ।*
*परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥टेक॥*
*अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया ।*
*निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥१॥*
*गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा ।*
*अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥२॥*
*परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा ।*
*परम पुंज परापरं, दादू निज दासा ॥३॥*
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भा०दी०-निर्गुणोपासनाया उत्कृष्टदशायां यादृशं ब्रह्म प्रतीयते तत्स्वरूपं दर्शयति । अतिसुन्दरं यस्य सत्तया जगच्चलति, सर्वसम्राइ परमप्राणस्वरूपं, य: सर्वेषु रमाणाद्राम:, कलातीत: सर्वमयोऽनुपमो निराकारो, मायातत्कार्यरहितो निराधारोऽस्ति । यस्याद्यन्तं नास्ति । अति गंभीरो धैर्यनिधिः परमपुरुषः सर्वभूतेष्वमरभावेन वास्तविकरूपेण स्थितोऽस्ति । यस्य तेजोमयस्य ज्ञानस्वरूपस्य प्रकाश: सर्वत्र प्रश्रितमस्ति । यश्च मायातीतेऽस्ति तस्यैव परमात्मनो दासोऽस्म्यहम् ।
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उक्तं हि योगवासिष्ठे 
यत्संवेद्य विनिर्मुक्त संवेदनमनिर्मितम् ।
चेत्यमुक्तं चिदामासं तद्विद्धि परम् पदम्॥
सा परमाकाष्ठा सादृशां दृगनुत्तमा ।
सा परा महिम्नां च महिमा गुरुणां सा तथा गुरुः ॥
स आत्मा तच्च विज्ञानं स शून्यं ब्रह्म तत्परम् ।
तच्छ्रेव स शिव शान्तः सा विद्या सा परास्थितिः ॥
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निर्गुण ब्रह्म की उपासना में जो उत्कृष्ट दशा है उसमें ब्रह्म की जो प्रतीति होती है उसका स्वरूप निर्देश कर रहे हैं । उस दशा में वह अति सुन्दर मालुम होता है । जो सत्तामात्र से सारे संसार को चलाने वाला सम्राट् है । सब में रमण करने के कारण उसको राम कहते हैं । 
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सोलह कलाओं से रहित सर्वमय अति अनुपम निराकार, माया और उसके कार्य से रहित निराधार है । जिसके आदि अन्त का पता नहीं चलता । वह आदि अन्त से रहित गम्भीर धैर्यनिधि परम पुरुष तथा सब भूतों में अपने वास्तविक अमर भाव से स्थित है । जिसका तेजोमय ज्ञान स्वरूप प्रकाश सब जगह फैला हुआ है । जो मायातीत हैं, मैं उसी परमात्मा का दास हूं ।
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योगवासिष्ठ में –
वह सर्वव्यापी होने से सब में स्थित है एवं वास्तव में ज्ञान और ज्ञेय से रहित सच्चिदानन्द परम पद स्वरूप है । वह ही परम पद सब की पराकाष्ठा है । वही संपूर्ण दृष्टियों में सर्वोत्तम दृष्टि है । वह ही सारी महिमाओं की सर्वोत्तम महिमा है । तथा वह ही गुरुओं का भी गुरु है, वही सबका आत्मा है और वही विज्ञान है, वही शून्य स्वरूप है, वही परब्रहम है, वही कल्याण है वह ही परम शान्त शिव तथा विद्या(ज्ञान) है, वही परमस्थिति है ।
(क्रमशः)

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