मंगलवार, 31 जनवरी 2023

*वैस किसोर जनैत पधारी*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ ।*
*हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*है पकवान बजैं हु निसान१,*
*सुनै नहिं कान सु उच्छव भारी ।*
*मांडत२ है मुख कृष्ण वधू रुख,*
*चौढि३ तुरी निशि गात सु नारी ॥*
*है जिवनार अपार भये नर,*
*मोटन४ बाँधत विप्र विचारी ।*
*हाथिन घोरन ऊंटन हूं रथ,*
*वैस किसोर जनैत पधारी ॥३०७॥*
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नरसीजी के घर में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी सबको साधारण नर नारी के समान प्रतीत होते थे। एक नरसीजी ही उनको यथार्थ रूप में जानते थे। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी ने नरसीजी के घर में अपने संकल्प से ही सर्व ऐश्वर्य प्रकट कर दिये। अब तो वहाँ अनेक स्थानों में पक्वान्न मिठाइयें बनने लगीं। नगाड़े१ बजने लगे, स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं। भारी उत्सव के कारण कोलाहल हो रहा था, इससे दूसरे की बात सुनाई भी नहीं देती थी।
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भगवान् श्रीकृष्णजी का रुख जानकर उनकी पटरानी नरसीजी के पुत्र के मुख पर शृंगार२ करने लगीं। रात्रि के समय वर को घोड़े३ पर चढ़ा कर बाजार में निकाला गया। उसके पीछे पीछे मंगल करती हुई बहुत सी नारियाँ चलीं।
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जीमने का समय आया तब असंख्य नर जीमने को आये। ब्राह्मणों ने बहुत से दिव्य पदार्थ देखकर ले जाने का विचार किया। फिर बड़ी बड़ी गठरियाँ४ बाँध बाँध कर ले जाने लगे। किन्तु वे पदार्थ घटने वाले थे ही नहीं।
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फिर सजे हुये हाथी, घोड़े, ऊँट और रथों पर किशोर अवस्था वाले दिव्य पुरुष चढ़े हुये चमकने लगे। इस प्रकार अद्भुत बारात सजाकर चली।
(क्रमशः)

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