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*गुरु उपदेश देहु कर दीपक, तिमिर मिटे सब सूझे ।*
*दादू सोई पंडित ज्ञाता, राम मिलन की बूझे ॥४॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १९३)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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महिमा - एक प्रश्न है । जो भक्त हैं उन्हें भी किसी समय निर्वाण की आवश्यकता है ?
श्रीरामकृष्ण - निर्वाण चाहिए ही, ऐसी कोई बात नहीं । इस तरह भी है कि कृष्ण भी नित्य हैं और भक्त भी नित्य हैं - चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम ।
"जैसे जहाँ चन्द्र है, वहीं तारे भी हैं । कृष्ण भी नित्य हैं और भक्त भी नित्य हैं ।
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तुम्हीं तो कहते हो - 'अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्' - और तुमसे तो मैंने कहा है कि जिस भक्त में विष्णु का अंश रहता है उसमें भक्ति का बीज नष्ट नहीं होता । मैं एक ज्ञानी (न्यांगटा) के पंजे में फंस गया, उसने ग्यारह महीने तक वेदान्त सुनाया । परन्तु वह मुझमें भक्ति का बीज बिलकुल नष्ट नहीं कर सका !
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घूम-फिरकर वही 'माँ माँ' ! जब मैं गाता था तब (न्यांगटा) रोने लगता था । कहता था - 'अरे, यह तूने क्या सुनाया !' देखो, इतना बड़ा ज्ञानी भी रोने लगता था । (छोटे नरेन्द्र आदि से) इतना समझ रखना, अलख लता का रस जब पेट में जाता है तो पेड़ होता ही है । भक्ति का बीज अगर पड़ गया, तो उससे क्रमश: पेड़ और फूल-फल होते ही हैं ।
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"‘मूषलं कुलनाशनम् ।' मूषल घिसकर जरा-सा रह गया था । उस थोड़े से अंश से यदुवंश का ध्वंस हो गया । चाहे लाख ज्ञान और विचार करो, भक्ति का बीज अगर भीतर रहा, घूम-फिरकर वही 'भज राम भज सीताराम ।'"
भक्तगण चुपचाप सुन रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण हँसते हुए महिमाचरण से कह रहे हैं - तुमको क्या अच्छा लगता है ?
महिमाचरण (हँसकर) - कुछ भी नहीं, आम अच्छा लगता है ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - अकेले अकेले ? न, आप भी खाओ और दूसरों को भी कुछ दो ?
महिमा (सहास्य) - देने की विशेष इच्छा तो नहीं है, अकेले खाया तो बुरा क्या है !
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श्रीरामकृष्ण - परन्तु मेरा भाव क्या है, जानते हो ? - क्या आँख खोलने ही से वे गायब हो जाते हैं ? मैं 'नित्य' और 'लीला' दोनों को लेता हूँ । उन्हें प्राप्त करने पर यह समझ में आ जाता है कि वे ही स्वराट् हैं और वे ही विराट् हैं । वे ही अखण्ड सच्चिदानन्द हैं और वे ही जीव-जगत् हुए हैं ।
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"साधना चाहिए । केवल शास्त्र रटने से नहीं होता । मैंने विद्यासागर को देखा, वह पढ़ा-लिखा खूब है, परन्तु अपने भीतर में क्या है उसने नहीं देखा । बच्चों को पढ़ा लिखाकर ही उसे आनन्द मिलता है । ईश्वर के आनन्द का स्वाद उसने नहीं पाया, केवल पढ़ने से क्या होगा ? धारणा कहाँ ? पंचांग में लिखा है वर्षा पूरी होगी, परन्तु पंचांग दबाओ तो कहीं बूँद भर भी पानी नहीं निकलता !"
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महिमा - संसार में कितने ही काम हैं, अवसर कहाँ मिलता है ?
श्रीरामकृष्ण – क्यों ? तुम तो सब स्वप्नवत् बतलाते हो ।
"सामने सागर देखकर लक्ष्मण ने धनुष लेकर कहा था, 'मैं वरुण का वध करूँगा । यही समुद्र हमें लंका नहीं जाने दे रहा है ।’ राम ने समझाया, 'लक्ष्मण, यह जो सब देख रहे हो, यह स्वप्नवत् अनित्य है न ? - अतएव समुद्र भी अनित्य है और तुम्हारा क्रोध भी अनित्य है । मिथ्या को मिथ्या के द्वारा मारना भी मिथ्या है ।’"
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महिमाचरण चुप हो रहे ।
महिमाचरण को बहुत से पारिवारिक काम करने पड़ते हैं और उन्होंने परोपकार के लिए एक नया स्कूल खोला है ।
श्रीरामकृष्ण (महिमा से) - शम्भु ने कहा, 'मेरी इच्छा है, ये रुपये सत्कार्य में लगाऊँ - स्कूल, दवाखाना खोल दूँ, रास्ताघाट तैयार करा दूँ ।'
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मैंने कहा, 'निष्काम भाव से कर सको तो अच्छा है, परन्तु निष्काम कर्म करना बड़ा कठिन है, न जाने किस तरफ से कामना निकल पड़ती है । तुमसे एक बात और पूछता हूँ, अगर ईश्वर तुम्हें मिल जायँ तो क्या तुम उनसे कुछ स्कूल, अस्पताल, दवाखाने ये सब माँगने लगोगे ?’
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एक भक्त - महाराज, संसारियों के लिए क्या उपाय है ?
श्रीरामकृष्ण - साधु-संग - ईश्वर की बातें सुनना ।
"संसारी मतवाले हो रहे हैं, कामिनी और कांचन में मत्त हैं । मतवाले को भात का पानी थोड़ा-थोड़ा सा पिलाते रहने पर वह अच्छा हो जाता है - उसे होश आ जाता है ।
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"और सद्गुरु के पास उपदेश लेना चाहिए । सद्गुरु के लक्षण हैं । जो वाराणसी गया हो और वाराणसी जिसने देखी हो, उसी से वाराणसी की बातें सुननी चाहिए । केवल पण्डित होने से नहीं होता । जिसे यह बोध नहीं हुआ कि संसार अनित्य है, उससे उपदेश न लेना चाहिए । पण्डित में विवेक और वैराग्य के रहने पर ही वह उपदेश दे सकता है ।
(क्रमशः)

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