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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ४१/४४*
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चंद्रमा कला बधै घटै, सूर कला सिस भाइ ।
कहि जगजीवन तेज हरि, अनंत कला मंहि आइ ॥४१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चन्द्रमा की कला घटती बढती रहती है । सूर्य की कलायें आकाश के सिर पर स्थित है । परमात्मा का तेज अनंत कलाओं में है ।
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गगन बजावै गुपत हरि, घड़ी घड़ी७ घडियाल८ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, कहूँ न बंचै काल ॥४२॥
(७. घड़ी घड़ी=एक समय विशेष पर) (८. घडियाल=भगवान् घंटा बजाकर सावधान करते हैं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि गगन में प्रभु गुप्त रुप से चेतावनी की घड़ी बार बार बजा कर जीव को सचेत करते हैं कि प्रभु के राम बिना काल किसी को नहीं छोडता है ।
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जब सुंनि९ मांहै जीव रहै, सब तैं म्रितक समांन ।
कहि जगजीवन रांम रटि, प्रेम पिवै गुर ग्यांन ॥४३॥
{९. सुंनि=शून्य(ब्रह्म)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब जीव सूक्ष्म हो कर शून्य में समाता है तो वो मृतक के समान होता है । वो गुरु ज्ञान से प्रेम मग्न हो राम रटते रहें ।
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अचेत सुंनि अचेत नर, चेतन चरन निवास ।
रांम भगति करि रांम लहै, सु कहि जगजीवनदास ॥४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव संसार विमुख हो शुन्य में समाता है । और जो भाव जागृत है उसका निवास प्रभु चरणों में होता है ।
(क्रमशः)

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