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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२८९)*
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*अथ राग हुसेनी बंगाल ॥१७॥*
*(गायन समय पहर दिन चढ़े, चंद्रोदय ग्रन्थ के मतानुसार)*
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*२८९. (फारसी) अनन्यता । त्रिताल*
*है दाना है दाना, दिलदार मेरे कान्हा ।*
*तूँ ही मेरे जान जिगर, यार मेरे खाना ॥टेक॥*
*तूँ ही मेरे मादर पिदर, आलम बेगाना ।*
*साहिब शिरताज मेरे, तूँ ही सुलताना ॥१॥*
*दोस्त दिल तूँ ही मेरे, किसका खिल खाना ।*
*नूर चश्म जिंद मेरे, तूँ ही रहमाना ॥२॥*
*एकै असनाव मेरे, तूँ ही हम जाना ।*
*जानिबा अजीज मेरे, खूब खजाना ॥३॥*
*नेक नजर मेहर मीरां, बंदा मैं तेरा ।*
*दादू दरबार तेरे, खूब साहिब मेरा ॥४॥*
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भा०दी०-हे सर्वसमर्थ परब्रह्म परमात्मन् ! त्वं बलवत्सु सर्वतोऽधिको बलवानसि । हे कृष्ण ! त्वमेव मे हृदयप्रिय: सुहृदस्ति । त्वमेव मे जीवनस्वरूपो हृदयास्थ: प्रियो जीवोऽसि । त्वमेव मे मित्रं सहायको निवासस्थानञ्चासि । त्वमेव मे माता पिता तथा परोजनोऽसि । त्वमेव मे स्वामी, सर्वशिरोमणिसम्राडसि ।
इदं मदीयं शरीरमपि त्वदीयम् । भवतां शुद्धं सच्चिदानन्दरूपमेव मे नेत्र-विषयोसि । हे दयालो परमेश्वर ! संसारेऽस्मिन् त्वमेव सर्वशोभास्पदोऽसि । त्वमेव मे पक्षकर्ता सहायकोऽसि । द्रविणमपि त्वमेव । हे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर ! ते दासस्तव द्वारि समुपस्थितोऽस्मि । कृपादृष्टिं प्रसारय ।
उक्तं मालविन्दार स्तोत्रे-
बंशी वदान्यो गुणवानृजुः शुचिर्मूदुर्दयालुर्मधुरःस्थिरसमः ।
कृतीकृतज्ञस्त्वमसि स्वभावतः समस्तकल्याणगुणामृतोदधिः ॥
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हे सर्वसमर्थ परमात्मन् ! आप बलवानो में से सबसे अधिक बलवान् हो । हे कृष्ण ! आप मेरे हृदय के प्यारे मित्र हो । आप ही मेरे जीवनस्वरूप हृदयस्थ प्यारे जीव हो । आप ही मेरे मित्र सहायक और निवास स्थान हो । आप ही मेरे माता पिता या पराये जन हो । आप ही मेरे प्रिय सर्वशिरोमणि सम्राट् हैं । यह शरीर भी आपका है ।
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आपका शुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूप मेरे नेत्रों का विषय बने । हे दयालु परमेश्वर ! संसार में आप ही शोभा के स्थान हैं । आप ही मेरा पक्ष लेने वाले सहायक हैं । धन भी मेरे लिये आप ही हैं । हे सर्वश्रेष्ठ परमात्मन् ! मैं आपका दास आपके द्वार पर उपस्थित हूं और दया की भीख मांग रहा हूं । कृपा वर्षा कीजिये ।
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मालविन्दारस्तोत्र में –
वह परमात्मा वदान्य और दयालु अर्थात् अकारण करुणावरुणालय हैं । दान शौण्द्र बहुप्रद वरदराज भी हैं । भगवान् के ये गुण जीव मात्र पर अहैतुकी कृपा प्रकट करने पर ही चरितार्थ होते हैं । अतः वे सब पर अयाचित कृपा करते रहते हैं । अतः मेरे पर भी दया की वर्षा कीजिये ।
(क्रमशः)

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