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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२८५)*
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*२८५. समता । बसंत ताल*
*एकही एकै भया आनंद, एकही एकै भागे द्वन्द ॥टेक॥*
*एकही एकै एक समान, एकही एकै पद निर्वान ॥१॥*
*एकही एकै त्रिभुवन सार, एकही एकै अगम अपार ॥२॥*
*एकही एकै निर्भय होइ, एकही एकै काल न कोइ ॥३॥*
*एकही एकै घट प्रकास, एकही एकै निरंजन वास ॥४॥*
*एकही एकै आपहि आप, एकही एकै माइ न बाप ॥५॥*
*एकही एकै सहज स्वरूप, एकही एकै भये अनूप ॥६॥*
*एकही एकै अनत न जाइ, एकही एकै रह्या समाइ ॥७॥*
*एकही एकै भये लै लीन, एकही एकै दादू दीन ॥८॥*
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भादी०- -मया जीवब्रह्मणोरैक्यज्ञानेनात्मस्वरूपे ब्रह्मणि स्थितेन ब्रह्मानन्दोऽवाप्त: तेन निर्द्वन्द्वो जातः । सर्वे समाना एव भासन्ते, निर्वाणपदञ्च प्राप्तम् । त्रिभुवनसारस्यामराभयपदवाच्यस्य ब्रह्मण: परिचयोऽपि जातः । इदानीं कालातीतस्य निर्भयस्य ब्रह्मज्ञानसंपन्नस्य निरञ्जने ब्रह्मणि स्थितिर्जाता । तत्र मातृपितृभेदोऽपि न भासते । किन्तु सर्वं सममेव परमात्मरूपं भासते । अनुपम ब्रह्म, तत्र स्थितस्य मे नान्यत्र गन्तुमिच्छा जायते । इत्थं समभावेन ब्रह्मणि स्थितं मे मनो ब्रह्मरूपं जातम् ।
उक्तंञ्च मुण्डके-
यथा नद्यः स्पन्दमाना: समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।
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जीव ब्रह्म ही एकता का ज्ञान होने से मैं आत्मस्वरूप ब्रह्म में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो गया । निर्द्वन्द्व होने से सब समान ही भासित होर हे हैं । अब मैं निर्वाण पद को प्राप्त हो गया हूँ । त्रिभुवन का सारभूत जो अमर, अभय, अपार, ब्रह्म पद का लक्ष्य है उसका मुझे परिचय हो गया । अब मैं निर्भय कालातीत हूं ।
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अन्तःकरण ज्ञानसंपन्न है और निरंजन निराकार ब्रह्म में मेरी स्थिति हो गई, एकत्वदशा में मातृपितृता आदि का भेद भाव भी समाप्त हो जाता है । अनुपम ब्रह्म ही केवल भासता है । अब अपने स्वरूप में लीन होने के कारण मेरा आना-जाना भी कहीं नहीं होता । इस तरह जिसका मन समभाव के कारण ब्रह्म में लीन हो गया वह ब्रह्मरूप हो जाता है ।
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जैसे मुण्डक में लिखा है कि –
जिस प्रकार बहती हुई नदियां नाम रूप को त्याग कर समुद्र में विलीन हो जाती है । वैसे ही विद्वान् ज्ञानी महात्मा नामरूप से मुक्त होकर उत्तम से उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

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