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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ३३/३६*
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जगजीवन आकार सब, देखत ही चलि जाइ ।
(ताथैं) रांम भगति करि रांम कहि, गोबिंद का गुन गाइ ॥३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में जितने भी दृष्टव्य आकार है वे देखते देखते ही अदृश्य हो जाते हैं । इसलिये है जीव राम जी की भक्ति कर राम कृष्ण की महिमा का गुणगान करें ।
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जगजीवन ऊँचा चढ़्या, साही करै पुकार ।
भाजि सकै तो भाजिये, जौरो गीधो९ लार ॥३४॥
(९. जौरो गीधो=-बलवान् गृध्र पक्षी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि काल हरकारा ऊंचा चढकर सावचेत कर रहा है कि भाग सको या बच सको तो भागो, गृध्र जो मांसाहारी है इस मांस रुपी जीवपिण्ड के पीछे लगा है ।
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काल कुसंगति देखतां, प्रतिष१० पाड़ै भेल११ ।
जगजीवन जो बैठिये, साकत सौं मन खेल ॥३५॥
(१०. प्रतिष=प्रत्यक्ष) (११. पाड़ै भेल=नाश कर लेता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुसंग काल जैसा है पतन की और ले जाता है । जो संगत में बैठता है उसका पतन ही होता है फिर भी जीव मन के अधीन हो ऐसा करते हैं ।
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काल सकाली१ नागनी, घर ही मांही खाइ ।
डसै संवारी२ सेज पर, जगजीवन गहि बांहि३ ॥३६॥
(१. काल सकाली=मृत्यु के सदृश) (२. संवारी सेज=सजी हुई शय्या पर) (३. बांहि=भुजा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि काल नागिन की भांति है जो घर में ही जीव को खा जाती है । यह सुन्दर रुप धारण कर, संसार रुपी शैय्या में विभिन्न रुप धारण कर जीव का नाश करती है ।
(क्रमशः)

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