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*दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव ।*
*अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०८ ध्यान । त्रिताल
नटनी निरख१ निहारले२, मत३ मांहि समाना ।
मन इन्द्रिय निज नाम सौं, ऐसी विधि ध्याना ॥टेक॥
बरत४ चढी बहु देखतां, तन मन चित बांधी ।
सहज समानी डोरि५ में, दह दिशि ह्वै आंधी ॥१॥
भांवरि भरि चौकसि६ लई, चेतन चढि बांसा ।
तन मन तो में रल गया, नहिं नजर तमासा ॥२॥
ऐसे सुरति नचायले, हरि आगे खेला ।
रज्जब राम उमग कर, दे दर्शन मेला ॥३॥२॥
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ध्यान की प्रेरणा कर रहे हैं -
✦ नटनी की दृष्टि१ को देखलो२, उसकी दृष्टि कितनी एकाग्र होती है । उसी के समान अपने विचार अन्तरमुख३ करके तथा मन इन्द्रियों को निज नाम में लगाकर, इस प्रकार ध्यान करो -
✦ जैसे नटनी अपने तन मन और चित को बांधकर अर्थात स्थिर करके बहुतों के देखते देखते रस्से४ पर चढ जाती है और उसकी नेत्र दृष्टि दशों दिशाओं से अंधी होकर अर्थात दशों दिशाओं को न देखकर स्वाभाविक रस्से५ में ही समायी रहती है ।
✦ वह सावधानी६ से भांवरि लेकर बांस पर चढ जाती है । उसका तन मन उस रस्से से मिल जाता है, खेल देखने वालों की और उसकी दृष्टि नहीं जाती है ।
✦ वैसे ही चेतन पर वृति को नचाले अर्थात वृत्ति को अन्य से हटा कर चेतन के आकार ही रख । इस प्रकार हरि के आगे खेलकर, तब रामजी प्रसन्न होकर दर्शन और मिलन का आनन्द प्रदान करेंगे ।
(क्रमशः)

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