शनिवार, 21 जनवरी 2023

*ईश्वरदर्शन तथा व्याकुलता*

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*मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।*
*शब्द गुरु का ताजणां, कोइ पहुंचै साधु सुजाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(४)ईश्वरदर्शन तथा व्याकुलता*
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सन्ध्या हुए बड़ी देर हो गयी । बलराम के बैठकखाने में दिये जल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण अब भी भावमग्न हैं । भावावेश में कह रहे हैं –
“यहाँ और कोई नहीं है, इसीलिए तुम लोगों से कह रहा हूँ, आन्तरिकता के साथ जो मनुष्य ईश्वर को जानना चाहेगा, उसका उद्देश्य अवश्य सफल होगा । जो व्याकुल है, ईश्वर के सिवा और कुछ नहीं चाहता, वह उन्हें अवश्य ही पायेगा ।
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“यहाँ के जितने आदमी थे – जिन्हें-जिन्हें आना था, वे सब आ चुके । इसके बाद जो आयेंगे वे बाहर के आदमी हैं । ऐसे लोग कभी कभी आ जाया करेंगे । माँ उन्हें बता दिया करेंगी कि तुम यह करो, वह करो, इस तरह ईश्वर को पुकारो आदि ।
"ईश्वर की ओर मन क्यों नहीं जाता ? ईश्वर से उनमें (महामाया में) बल अधिक है । जज से उसके चपरासी में शक्ति अधिक है । (सब हँसते हैं)
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"नारद से राम ने कहा, 'नारद, तुम्हारी स्तुति से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, तुम कोई वर लो ।' नारद ने कहा, 'राम ! यह करो, तुम्हारे पादपद्मों में मेरी श्रद्धा-भक्ति रहे और तुम्हारी भुवनमोहिनी माया में न पड़ जाऊँ ।' राम ने कहा, 'तथास्तु, कोई वर और लो ।’ नारद ने कहा, ‘राम ! और कोई वर मुझे नहीं चाहिए ।'
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"इस भुवनमोहिनी माया में सभी मुग्ध हो रहे हैं । ईश्वर जब देह धारण करते हैं, तो वे भी मुग्ध हो जाते हैं । सीता के लिए राम कितना रोये थे । 'पंचभूत के पिंजड़े में पड़कर ब्रह्म को रोना पड़ता है ।'
"परन्तु एक बात है - ईश्वर जब चाहें तभी मुक्त हो सकते हैं ।"
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भवनाथ - Guard(गार्ड) अपनी इच्छा से रेलगाड़ी के भीतर अपने को कैद करता है । परन्तु वह जब चाहे तब उतर सकता है ।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वरकोटि - जैसे अवतार आदि - जब चाहें तब मुक्त हो सकते हैं । जो जीवकोटि हैं, वे नहीं हो सकते । जीव कामिनी और कांचन में बद्ध हैं । कमरे के द्वार और झरोखे स्क्रू (पेंच) से कसे हुए हैं । कैसे निकल सकते हैं ?
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भवनाथ - (सहास्य) जैसे रेल के तीसरे दर्जें के मुसाफिर, दरवाजे में चाभी लगा देने पर फिर नहीं निकल सकते ।
गिरीश - जीव अगर इस तरह बँधा हुआ है तो उसके लिए कोई उपाय है ?
श्रीरामकृष्ण - हाँ, गुरु के रूप से ईश्वर अगर स्वयं ही मायापाशों का छेदन करें तो फिर भय की कोई बात नहीं ।
(क्रमशः)

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