मंगलवार, 10 जनवरी 2023

'मेरा-मेरा' करना - अज्ञान से

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*दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।*
*माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"नरेन्द्र जब पहले-पहल आया था, तब इसकी छाती पर हाथ रखते ही यह बेहोश हो गया । फिर होश में आकर रोते हुए कहने लगा - 'अजी, मुझे तुमने ऐसा क्यों कर दिया ? – मेरे बाबूजी हैं - मेरी माँ जो हैं ।' 'मेरा-मेरा' करना, वह अज्ञान से होता है ।
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“गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार मिथ्या है, तू मेरे साथ निकल चल ।' शिष्य ने कहा, 'महाराज, ये सब मुझे इतना चाहते हैं - मेरे बाबूजी, मेरी माँ, मेरी स्त्री - इन्हें छोड़कर मैं कैसे जाऊँ ? गुरु ने कहा, 'तू मेरा-मेरा करता तो है, और कहता है कि ये सब प्यार करते हैं, परन्तु यह सब भूल है । मैं तुझे एक उपाय बतलाता है, उसे करके देख, तो तू समझ जायेगा कि ये लोग तुझे सचमुच प्यार करते हैं या इसमें दिखावट है ।'
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यह कहकर एक दवा उन्होंने उसके हाथ में दी और कहा, 'इसे खा लेना, खाने पर तू मुर्दे की तरह हो जायेगा तेरा ज्ञान नष्ट न होगा, तू सब देख-सुन सकेगा । फिर मेरे आने पर क्रमश: तेरी पहले की अवस्था हो जायेगी ।'
"शिष्य ने ठीक वैसा ही किया । घर में सब रोने लगे ।
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उसकी माता, स्त्री, सब के सब उल्टी पछाड़ें खाने लगी । इसी समय एक ब्राह्मण ने आकर पूछा, 'यहाँ क्या हुआ है ?" उन लोगों ने कहा, "महाराज, इस लड़के को राम ले गये ।' ब्राह्मण ने उस मुर्दे का हाथ देखकर कहा, 'यह क्या - यह तो मरा नहीं है । मैं एक दवा देता हूँ, उसके खाने से यह अभी चंगा हो जायेगा । उस समय डूबते हुए को जैसे सहारा मिल गया, - घरवाले बड़े प्रसन्न हुए ।
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तब ब्राह्मण ने कहा, ‘परन्तु एक बात है, पहले एक दूसरे आदमी को दवा खानी पड़ेगी, फिर इसे । परन्तु पहले जो दवा खायेंगे, उनकी मृत्यु अनिवार्य है । इसके तो अपने आदमी बहुत हैं, कोई न कोई दवा अवश्य ही खा लेगा । इसकी माँ और इसकी स्त्री बहुत रो रही हैं, ये लोग तो अनायास ही दवा खा लेंगी ।'
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"तब वे सब की सब रोना-धोना बन्द करके चुप हो रहीं । माता ने कहा, 'ऐं, यह इतना बड़ा परिवार, मैं अगर मर गयी तो इन सब की देख-रेख के लिए कौन रहेगा ?’ - यह कहकर वे सोचने-विचारने लगीं । उसकी स्त्री कुछ देर पहले रो रही थी - ‘अरी मेरी दीदी, मुझे यह क्या हो गया – री - ' उसने कहा, 'अरे उन्हें जो होना था, सो तो हो चुका, मेरे दो-तीन नाबालिग लड़के-बच्चे हैं, मैं अगर मर गयी तो फिर इन्हें कौन देखेगा ?'
"शिष्य सब देख-सुन रहा था । वह उठकर खड़ा हो गया और कहा, 'गुरुजी, चलिये, आपके साथ चलता हूँ ।' (सब हँसते हैं)
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"एक शिष्य और था । उसने अपने गुरु से कहा था, "मेरो स्त्री मेरी बड़ी सेवा करती है, गुरुजी, मैं उसी के लिए संसार नहीं छोड़ सकता ।' वह शिष्य हठयोग करता था । गुरु ने उसे भी एक उपाय बतलाया । एकाएक उसके घर में खूब रोना-धोना मच गया । पड़ोसवालों ने आकर देखा, घर में आसन लगाकर हठयोगी बैठा हुआ था, - देह के पुर्जे-पुर्जे टेढ़े हो गये थे ।
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सब ने समझा, उसके प्राण निकल गये हैं । स्त्री पछाड़ें खा रही थी - 'अरे, मेरे भाग्य में क्या यही लिखा था रे - हम अनाथों को छोड़कर तुम कहाँ चले गये – राम - अरी मेरी दीदी री - ऐसा होगा यह मैं नहीं जानती थी री –’ इधर उसके आत्मीय और मित्र खाट ले आये । उसे घर से निकालने लगे ।
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"इसी समय एक अड़चन हुई । सब देह टेढ़ी हो जाने के कारण, लाश कोठरी के द्वार से निकलती न थी । तब एक पड़ोसी दौड़कर कटारी लेकर चौखट काटने लगा । स्त्री अधीर होकर रो रही थी । वह काटने की आवाज सुनकर दौड़ी हुई आयी । रोते हुए उसने पूछा - 'यह क्या करते हो – दा - दा –’ उन लोगों ने कहा, 'ये नहीं निकलते इसलिए चौखट काट रहा हूँ ।'
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तब स्त्री ने कहा - 'अरे मेरे दादा - ऐसा काम न करो, मैं तो राँड़ अब हो ही गयी हूँ । मेरे घर का सम्हालनेवाला तो अब कोई रहा ही नहीं, कुछ नाबालिग बच्चे हैं, उन्हें पालकर आदमी बनाना है ! यह दरवाजा चला जायेगा तो दूसरा होने का है ही नहीं, उन्हें जो होना था, सो तो हो ही चुका - उन्हीं के हाथ-पैर काट दो ।' तब हठयोगी उठकर खड़ा हो गया । तब दवा का असर जाता रहा था ।
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खड़ा होकर उसने कहा - 'क्यों री साली, हाथ-पैर कटाती है ?' यह कहकर घर छोड़ गुरु के पास चला गया । (सब हँसते हैं)
"बड़ा ढोंग करके स्त्रियाँ रोती हैं । रोने की खबर मिलती है, तो पहले नथ खोल डालती हैं, फिर और और गहने खोलकर सन्दूक के अन्दर ताला लगाकर सुरक्षित रख देती हैं । फिर पछाड़ खा-खाकर रोती हैं - 'अरी दीदी - मेरा यह क्या हुआ री –’ "
(क्रमशः)

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