मंगलवार, 10 जनवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १०१*

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*राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥*
*विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा ।*
*भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १७३)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग टोडी । (गायन दिन ६ से १२)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०१ कालादि भय । त्रिताल
डर है रे मूझ डर है रे,
पल पल आयु घटे तन छीजे, जम वैरी शिर पर है रे ॥टेक॥
बादल विपति बीजली मनसा१, विविध विघ्न का झर२ है रे ।
चोरासी लख जीव जवासे, तेरी केतक जर३ है रे ॥१॥
आपा४ अग्नि अनन्त दौं५ लागी, पंच तत्व सब तरु है रै ।
महर६ मेघ बिन कौन बुझावे, तन मन तूतिनु७ खरु८ है रे ॥२॥
दीरघ दु:ख दीसे दश हूँ दिशि, मीच सु सचराचर है रे ।
काल कमाई प्राण पशू ये, सब के शिर पर कर है रे ॥३॥
त्राहि त्राहि यहु त्रास देखकर, हरि सुमिरण को हरु९ है रे ।
जन रज्जब जोख्यूं१० टारन को, एक राम को बरु११ है रे ॥४॥१८॥
१०१-१०२ में कालादि का भय दीखा रहे हैं -
✦ मुझको भय है, भय है । क्षण क्षण में आयु घट रही है । शरीर क्षीण हो रहा है शिर पर यमराज रूप शत्रु खड़ा है ।
✦ विपति रूप बादल में आशा१ रूप बिजली चमक रही है, नाना भांति विघ्न रूप झड़२ लग रहा है । उस में चौरासी लाख योनिओं के जीव रूप जवासे जल रहे हैं, फिर तेरी तो कितनीक जड़३ है ? अर्थात तू कैसे बचेगा ?
✦ अहंकार४ रूप अग्नि से अनन्त दावाग्नि५ लग गई है, पंच तत्त्व ही सब वृक्ष हैं, और तेरा तन मन तो बेकार८ तूतना७ घास के समान है । प्रभु कृपा६ रूप मेघ के बिना इसे कौन बुझायेगा ?
✦ दशों दिशाओं में ही महान दु:ख दिखाई दे रहे हैं सचर और अचर सबकी मृत्यु होने वाली है अर्थात सभी नष्ट होंगे । काल रूप कसाई का संपूर्ण प्राणी रूप पशुओं के शिर पर हाथ है अर्थात सबके शिर काल ने पकड़ रक्खे हैं ।
✦ इस काल भय१० को हटाने में एक राम का ही बल११ समर्थ है । अत: यह कष्ट देखकर रक्षा करो, पुकारते हुये हरि स्मरण की ही इच्छा९ हो रही है ।
(क्रमशः)

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