मंगलवार, 10 जनवरी 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #२८२

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२८२)*
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*२८२. भेष विडम्बना (ललित ताल)*
*हम पाया, हम पाया रे भाई,*
*भेष बनाय ऐसी मन आई ॥टेक॥*
*भीतर का यहु भेद न जानै,*
*कहै सुहागिनी क्यों मन मानै ॥१॥*
*अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं हीं,*
*भई सुहागिनी लोगन मांहीं ॥२॥*
*सांई स्वप्नै कबहुँ न आवै,*
*कहबा ऐसे महल बुलावै ॥३॥*
*इन बातन मोहि अचरज आवै,*
*पटम किये कैसे पीव पावै ॥४॥*
*दादू सुहागिनी ऐसे कोई,*
*आपा मेट राम रत होई ॥५॥*
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भादी०-सद्रूपवेशधारिणां दाम्भिकानामाचरवन्त संसारमेवमुपदिशन्ति । यत् हे सांसारिका जना: ! अस्माभिस्तु प्रभुः प्राप्त इति मिथ्यैव स्वदम्भं प्रकटीकुर्वन्ति । न हि ते दाम्भिकाः स्वप्नेऽपि प्रभुं पश्यन्ति, कुतो जाग्रदवस्थायाम् ? विषयवासनासंवलितेनान्तःकरणे प्रभुरहस्यं कोऽपि न जानाति । येन स्वप्नेऽपि प्रभुर्न दृष्टः कुतस्तस्य सौभाग्यं संभवेत् ? लोके तु ते मिध्याप्रचारेण स्वात्मानं सौभाग्यवन्तं प्रचारयन्ति । नहोतादृशानां दाम्भिकानां विश्वास: कार्यः । न च तेषु प्रसीदति भगवान् ते त्वात्यानमपि वञ्चयन्ति । एतादृशं दाम्भिकानामाचरणं श्रुत्वा महदाश्चर्यं भवति । अहो तादृशपाखण्डेन कथं प्रभुः प्रसीदेत् । यो हि पाप-पाखण्डजन्याहंकारं परित्यज्य रामभक्तावनुरक्तो भवति स एव सौभाग्यवान् मन्तव्यः । तस्मै प्रभुः प्रसीदति । तस्मात्पापात्मकं पाखण्डं विहाय हरिभक्तिरेव समाश्रयणीया ।
उक्तं हि मनुस्मृतौ ::
न सीदनपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।
अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन् विपर्ययम् ॥
अधर्मेनणैयते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु स नश्यति ॥
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दाम्भिक पुरुष अपनी ख्याति प्राप्त करने के लिये सन्तों का वेश बना आकर संसारी लोगों को झूंठ ही कहता है कि हमने तो परमात्मा को जान लिया । उस दाम्भिक पुरुष ने तो स्वप्न में भी कभी-प्रभु का आलिंगन नहीं किया तो वह जागृत् में प्रभु को कैसे जान सकता है ? जिस स्त्री ने अपने पति का आलिंगन नहीं किया तो उसका सुहाग-सौभाग्य कैसे माना जा सकता है ?
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वैसे ही दाम्भिक पुरुष अपने को मिथ्या ही सौभाग्यवान् कहता है । उसने प्रभु का आलिंगन किया ही नहीं । ऐसे दाम्भिक पुरुषों का मैं विश्वास नहीं करता । उन पर प्रभु की भी कृपा नहीं होती । किन्तु जो पाप, पाखण्ड, अहंकार आदि को त्याग कर प्रभु भक्ति में अनुरक्त रहता है वह ही सौभाग्यवान् है । उसी पर प्रभु प्रसन्न होते हैं । अतः साधक को पाप, पाखण्ड, अहंकार आदि को त्याग कर हरि-भक्ति करनी चाहिये ।
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मनुस्मृति में –
पापी अधर्मियों की शीघ्र ही दुर्गति होती है, ऐसा समझ कर मनुष्यों को चाहिये कि धर्म के पालन में दुःख होने पर भी अधर्म में अपने मन को न लगावें । अधर्मी पहले बढता है, फिर वह अधर्म को ही अच्छा मानता है, फिर अपने शत्रुओं को भी जीत लेता है । लेकिन अन्त में जड़ सहित नष्ट हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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