सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

*शुचिता और अशुचिता का विचार*

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*काया माँही खेलें रास,*
*काया माँही विविध विलास ।*
*काया माँही बाजैं बाजे,*
*काया माँही नाद धुनि साजे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३६३)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण - शुचिता और अशुचिता का विचार भक्त के लिए है, ज्ञानी के लिए नहीं । विजय की सास ने कहा, 'मेरा क्या हुआ ? अब भी तो मैं सब की जूठन नहीं खा सकती ।' मैंने कहा, सब की जूठन खाने ही से ज्ञान होता है ?
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कुत्ते जो पाते हैं वही खा लेते हैं, इसलिए क्या कुत्ते को बड़ा ज्ञानी कहें ?
(मास्टर से) "मैं पाच तरह की तरकारियाँ इसलिए खाया करता हूँ कि सब तरह की रुचि रहे - कहीं एक ही ढर्रे में पड़ गया तो इन्हें(भक्तों को) छोड़ न देना पड़े ।
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"केशव सेन से मैंने कहा, 'और भी बढ़कर अगर बातचीत की जायेगी तो तुम्हारा यह दल फिर न रह जायेगा । ज्ञान की अवस्था में दल-बल सब स्वप्नवत् मिथ्या हैं ।'
"पक्षी का घोंसला अगर कोई जला देता है, तो वह उड़ता फिरता है, आकाश में आश्रय लेता है । अगर देह, संसार यह सब मिथ्या भासित हो, तो आत्मा समाधिमग्न हो जाती है ।
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"पहले मेरी ज्ञानी की अवस्था थी । आदमी अच्छे नहीं लगते थे । हाटखोला में एक ज्ञानी है अथवा अमुक स्थान पर एक भक्त है, इस तरह की बात मैं सुनता था; फिर कुछ दिन में सुनता, वह तो गुजर गया । इसीलिए आदमी अच्छे नहीं लगते थे । फिर उन्होंने(जगदम्बा ने) मन को उतारा, भक्ति और भक्तों में मन को लगा दिया ।"
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मास्टर अवाक् हैं । श्रीरामकृष्ण की अवस्थाओं के बदलने की बातें सुन रहे हैं । अब श्रीरामकृष्ण यह बतला रहे हैं कि ईश्वर आदमी होकर क्यों अवतार लेते हैं ।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - भगवान मनुष्य-रूप में क्यों अवतार लेते हैं, जानते हो ? नरदेह के भीतर उनकी बातें सुनने को मिलती हैं । इसके भीतर उनका विलास है, इसके भीतर वे रसास्वादन करते हैं ।
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"और अन्य सब भक्तों में उनका थोड़ा-थोड़ा सा प्रकाश हैं । जैसे किसी चीज को खूब चूसने पर कुछ रस मिलता है, अथवा फूल को चूसने पर कुछ मधु । (मास्टर से) तुम यह बात समझे ?"
मास्टर - जी हाँ, मैं खूब समझा ।
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श्रीरामकृष्ण द्विज के साथ बातचीत कर रहे हैं । द्विज की उम्र १५-१६ साल की है । उनके पिता ने अपना दूसरा विवाह किया है । द्विज प्राय: मास्टर के साथ आया करते हैं । श्रीरामकृष्ण उन पर स्नेह करते हैं । द्विज कह रहे हैं कि उनके पिता उन्हें दक्षिणेश्वर नहीं आने देते ।
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श्रीरामकृष्ण (द्विज से) - क्या तेरे भाई भी मुझे अवज्ञा की दृष्टि से देखते हैं ?
द्विज चुप हैं ।
मास्टर - संसार की कुछ ठोकरें खाने पर जिनमें कुछ अवज्ञा है भी वह भी दूर हो जायेगी ।
श्रीरामकृष्ण - विमाता हैं, धक्के तो मिलते ही होंगे ।
सब कुछ देर चुप रहे ।
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श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - पूर्ण के साथ इसे तुम मिला क्यों नहीं देते ?
मास्टर - जी हाँ, मिला दूँगा । (द्विज से) पानीहाटी जाना ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, इसीलिए मैं सबसे कहा करता हूँ - इसे भेज देना, उसे भेज देना । (मास्टर से) तुम जाओगे या नहीं ?
श्रीरामकृष्ण पानीहाटी के महोत्सव में जायेंगे । इसीलिए भक्तों से वहाँ जाने की बात कह रहे हैं ।
मास्टर - जी हाँ, इच्छा तो है ।
श्रीरामकृष्ण - बड़ी नाव किराये से ले ली जायेगी । वह डाँवाडोल न होगी । गिरीश घोष क्या नहीं जायेगा ?
(क्रमशः)

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