सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १११*

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*देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ ।*
*दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१११ आद्यन्त एक । झपताल
ज्यों पहले पीछे त्यों होय, 
कारज सरै१ सत्य कर जोय ॥टेक॥
तीन मास वर्ष्यों कुछ नांहि, 
साख समंगल चौथे मांहिं ॥१॥
पहले सबन लेय नहिं आश, 
पिछले सबन पड़े विश्वास ॥२॥
मुंह मिल भये नांहिं कछु नीति, 
रज्जब रोप रहे रण जीति ॥३॥५॥
आदि से अंत तक एक ही लगन होती है तब ही कार्य सिद्ध होता है यह कह रहे हैं -
✦ जो पहले जैसा होता है, वैसे ही पीछे भी रहता है, उसका कार्य वा वह कार्य सिद्ध१ होता है, यह सत्य ही समझो ।
✦ तीन मास बरसने पर भी यदि चौथे महीने में लाख निर्विघ्न घर में नहीं आवे तो वह तीन मास का बरसना कुछ नहीं । पहले तीन मास में सब लोग धान को ग्रहण नहीं कर पाते, आशा ही करते हैं और पिछले चौथे मास में तो पक जाने सब लोगों को घर ले जाने का विश्वास हो जाता है ।
✦ वैसे ही साधन के आरम्भ से साधन की परिपाकावस्था तक साधन एक रस चलता है तब उसके फल प्रभु प्राप्ति का विश्वास हो जाता है ।
✦ जब वीरों की सेना के मुख मिल जाते हैं तब नीति का निर्वाह कुछ भी नहीं होता, वहां तो जो रण को जीतता है, वही पैर रोप कर खड़ा रहता है, वैसे ही योग संग्राम में कामादि शत्रुओं को जीतता है, वही खड़ा रह सकता है । अत: साधन के आरम्भ में जैसे लग्न होती है वैसे ही अंत तक रहती है तो मुक्ति रूप कार्य सिद्ध हो जाता है ।
(क्रमशः)

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