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*कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण ।*
*दादू सो कतहुँ गया, माटी धरी मसाण ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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दुनियां सबै तुम्हारी रांम ।
और सबै कहै बेकांम ॥टेक॥
अकबर कहै दुनीं सब म्हारी ।
दीन्हीं पावै सब को बारी ॥
राजा कहै गांव गढ म्हारौ ।
प्रांण चलै तब नहीं असारौ ॥
राणौं सबै देस अपणावै ।
जब र चलै कछु संगि न आवै ॥
सब काहू का तूं हरता करता ।
मैं मैं करैं सु दीसैं मरता ॥
गुर दादू किरपा थैं जांणीं ।
टीला तासूं लावो प्रांणीं ॥२५॥
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हे रामजी ! यह सारी दुनिया आपकी है । आपही इसके एकमात्र स्वामी हैं । यदि कोई इसको अपनी बताता है तो उसका ऐसा कथन व्यर्थ है ॥ टेक॥
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अकबर कहता है, यह सारी दुनिया मेरी है, मैं इसका जहाँपनाह हूँ किन्तु यह बात असत्य है क्योंकि अकबर ही क्या, अन्य सब भी जो कुछ पाते हैं वह सब कुछ तेरे द्वारा दिया हुआ ही पाते हैं ।
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राजा कहता है, यह गाँव, गढ़ सब कुछ मेर है किन्तु जब प्राणान्त होता है तब इनमें से कोई भी आश्रय=सहारा नहीं देता । राणा सारे देश पर अपना स्वामित्व जताता है किन्तु जब वह परलोक जाने की तैयारी करता है तब साथ में चलने को कोई भी उसके पास नहीं आता । कोई भी उसके साथ नहीं जाता ।
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हे रामजी ! तू ही सभी का कर्ता, धर्ता, संहर्ता है । इसके विपरीत जो ‘मैं, ‘मैं’ करते हैं वे सब अन्त में मरते हुए ही देखे गए हैं । टीला कहता है, गुरुमहाराज दादूजी की कृपा से जो रामजी की भक्ति को जानी है, उसमें अनुरक्ति पैदा करो तथा जिस जगत् की नश्वरता को जानी है उस जगत् के राग को परित्याग करो और अहर्निश रामजी का स्मरण करो ॥२५॥
(क्रमशः)

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