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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ६९/७२*
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वोला ज्यूं अस्थूल२ है, ताकी कैसी आस ।
हरि भजि अरथ३ लगाइ लै, सु कहि जगजीवनदास ॥६९॥
{२. अस्थूल=स्थूल(विनाशी)} {३. अरथ=अर्थ(=अभिप्राय) मतलब}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो देह बारिश के ओलों जैसे स्थूल है उससे क्या आशा रखी जाये । हे जीव परमात्मा का भजन कर उसी से मतलब रखें ।
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खाणां पीणां खेलणां, सकल काल का फंदा४ ।
जगजीवन जांणै नहीं, जीव मूढ़ मति मंद५ ॥७०॥
{४. फंद=पाश(बन्धन)} {५. मति मंद=अल्पबुद्धि(मूर्ख)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में खाना खेलना पीना ये सब काल पाश है । संसार के जीव इसे जानते ही नहीं वे अल्पज्ञ हैं ।
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साध कही सब हरि कही, कनक कामिनी काल ।
जगजीवन सो त्यागिये, मन थैं माया जाल ॥७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन भी वे सब ही कहते हैं जो परमात्मा कहते हैं कि धन व स्वर्ण व स्त्री सब ही काल रुप है । अतः इसे मन से इस माया जाल को त्याग देना चाहिये ।
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मनसा मांही रांम तजि, आवै सो ही काल ।
जगजीवन सो बंचिये, अकल पुरीष के नाल६ ॥७२॥
(६. नाल=साथ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मनसे राम त्याग कर जो आता है वह काल ही है । उससे वह ही बच पाता है जो परमात्मा के साथ रहता है ।
(क्रमशः)

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