गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

*कृष्ण कहैं नरसी चलिये तुम*

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*प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि ।*
*रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहैं तिनको देहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर,राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*कृष्ण कहैं नरसी चलिये तुम,*
*आवत हूँ नभ मारग मानो।*
*आप हि जानहु मैं उर आनहु,*
*है सुख फैंट हि ताल रखानो ॥*
*लेय उठाय सु बोझ सबै,*
*हरि जाय रहे समधी पुर जानौं।*
*भेजत है नर आय रु देखत,*
*फौज किसी इमि पूछ बखानौं ॥३०८॥*

तब श्रीकृष्णभगवान् ने नरसीजी को कहा- अब बारात को साथ लेकर तुम चलो और मैं भी आकाश मार्ग से आता हूँ, इतनी बात तो मेरी मान लो।
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नरसीजी हाथ जोड़ कर कहा- "महाराज! बारात और विवाह की बात तो सब आप ही जानें, यह आप ही का काम है। मैं तो हृदय में आपका ध्यान लगाना और जहाँ कहो फेंट बाँधकर तथा करताल हाथ में ले, आनन्द से आपका गुण गाता चलूं, यह जानता हूँ। इसी में मुझे सुख होता है।"
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यह सुनकर प्रभु ने विचार किया कि सत्य कहते हैं। फिर बारात आदि का सब भार भगवान् ने ही उठाया। बारात को ले जाकर समधी की पुरी के पास ठहराया।
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विवाह का दिन था, समधी ने कई मनुष्य भेजे थे कि जाकर देखो मार्ग में बारात आती होगी। उनने आकर बारात को देखा तो आश्चर्य से पूछा- यह फौज किस की है। बरातियों ने उत्तर दिया—यह नरसी महता के पुत्र शामलदास की बरात है, सेना नहीं है।
(क्रमशः)

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