गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

*२८. काल कौ अंग ४५/४८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ४५/४८*
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अघोर१० सुंनि अग्यांन नर, आठौं पहर अचेत ।
कहि जगजीवन परम पुरुष घर, हरिजन सदा अचेत ॥४५॥
(१०. अघोर=भयानकतारहित, सौम्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव भय रहित हो आठो पहर संसार में मस्त रहता है । संत कहते हैं कि परमात्मा के घर में सभी जीव संसार के प्रति अचेत रहते हैं वे ही प्रभु के बंदे होते हैं ।
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कहि जगजीवन कल थैं, सकल रहै भै भीत ।
रांम क्रिपा थैं साध के, सो मन बसै नचीत१ ॥४६॥
(१. नचीत=निश्चिन्त)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो कलियुग जीव हैं वे सदा भयभीत रहते हैं । और सभी साधुजन राम कृपा पर थे वे निश्चिंत होते हैं ।
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काल बंचै करता पुरष, जे तुम करौ सहाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, (मेरे) तुम बिन दूजा नांहि ॥४७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम काल से बच सकते हैं यदि हे कर्ता पुरुष तुम सहाई हो जाओ । संत कहते हैं कि मेरे आपके बिना कोइ सहायक नहीं है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, कहर२ काल की चोट ।
क्रिपा तुम्हारी ऊबरै३, चरण कँवल की वोट ॥४८॥
(२. कहर=संकटमय) (३. ऊबरै=उद्धार हो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु काल की चोट बहुत कष्टदायी होती है । तुम्हारी कृपा व चरणों की शरण से ही इससे उबर सकते हैं ।
(क्रमशः)

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