🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*आत्म चेतन कीजिए, प्रेम रस पीवै ।*
*दादू भूलै देह गुण, ऐसैं जन जीवै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
"सामाध्यायी ने कहा था, ईश्वर नीरस है । जो रसस्वरूप हैं, उन्हें बतलाता था नीरस ! जैसे किसी ने कहा था - मेरे मामा के यहाँ गोशाले में बहुत घोड़े हैं । (सब हँसते हैं)
"संसारी मतवाले हो रहे हैं । वे सदा सोचते हैं, मैं ही यह सब कर रहा हूँ, और घर द्वार यह सब मेरा है । दाँत निकालकर कहता है - इनके (स्त्री आदि के) लिए फिर क्या होगा ? मैं न रहूँगा तो इनके दिन कैसे कटेंगे ! मेरी स्त्री को और मेरे परिवार को कौन सम्हालेगा ?’
.
राखाल ने कहा, 'मेरी स्त्री की फिर क्या दशा होगी ?’ ”
हरमोहन - राखाल ने ऐसी बात कही ?
श्रीरामकृष्ण - इस तरह नहीं कहेगा तो क्या करेगा ? जिसे ज्ञान है, उसे अज्ञान भी है । लक्ष्मण ने राम से कहा, 'भाई ! बड़े आश्चर्य की बात है, साक्षात् वशिष्ठदेव भी पुत्रों के शोक से विकल हो रहे हैं !'
.
राम ने कहा, 'भाई, जिसे ज्ञान है, उसे अज्ञान भी है । भाई ! ज्ञान और अज्ञान के पार हो जाओ ।'
"जैसे किसी के पैर में एक काँटा लगा है । वह उस काँटे को निकालने के लिए एक और काँटा ले आता है । फिर उस काँटे से काँटा निकालकर दोनों काँटे फेंक देता है । अज्ञान-काँटे को निकालने के लिए ज्ञान-काँटे की जरूरत होती है ।
.
फिर ज्ञान और अज्ञान दोनों काँटों को फेक देने पर जो कुछ रह जाता है वह विज्ञान है । ईश्वर है, इसका आभासमात्र लेकर उन्हें अच्छी तरह जानना पड़ता है, और उनसे खास तौर से बातचीत की जाती है, यह विज्ञान है । इसीलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है, "भाई, तीनों गुणों से पार हो जाओ ।’
.
"इस विज्ञान को प्राप्त करने के लिए विद्यामाया को अपनाना पड़ता है । ईश्वर सत्य हैं, संसार अनित्य है, यह विचार है, अर्थात् विवेक और वैराग्य है । और उनके नामों और गुणों का कीर्तन, ध्यान, साधुसंग, प्रार्थना ये सब विद्यामाया के अन्दर हैं । विद्यामाया जैसे छत की ऊपरवाली कुछ सीढ़ियाँ हैं, और एक सीढ़ी उठने ही से छत है । (छत में उठने का अर्थ है ईश्वरलाभ)
.
"विषयी लोग मतवाले हो रहे हैं । कामिनी और कांचन में मत्त है, होश नहीं । इसीलिए तो इन लड़कों को मैं प्यार करता हूँ । उनमें कामिनी-कांचन का प्रवेश अभी नहीं हुआ । आधार अच्छा है, ईश्वर के पास पहुँच सकते हैं । संसारियों में काँटे चुनते ही चुनते सब साफ हो जाता है - मछली नहीं मिलती ।
.
"संसारी लोग ओले की चोट खाये हुए आम के सदृश होते हैं । यदि तुम उन आमों को ईश्वर को अर्पण करना चाहते हो तो उन्हें गंगाजल से धोकर शुद्ध कर लेना पड़ता है । परन्तु फिर भी ऐसे फल बहुत कम पूजा में चढ़ाये जाते हैं । परन्तु उन्हें यदि चढ़ाना ही पड़े तो ब्रह्मज्ञान के सहित, अर्थात् तुम्हें यह समझ लेना पड़ता है कि सब कुछ ईश्वर ही हुए हैं ।"
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें