शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

*२८. काल कौ अंग ४९/५२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*२८. काल कौ अंग ४९/५२*
.
सुख दुख संसै देह मैं, जीवन मरण जंजाल ।
कहि जगजीवन रांमजी, क्यों करि बंचै काल४ ॥४९॥
(४. काल=मृत्यु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सुख दुख व संशय जीवन मरण सभी इस शरीर के साथ है । फिर जीव इस काल से कैसे बच सकता है ।
.
नख सिख भरिये नांम हरि, आपण प्रगटहु आइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, काल बंचै गुण गाइ ॥५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सम्पूर्ण देह में हरि नाम भर ले तो प्रभु आप ही आकर प्रकट हो जायेंगे संत कहते हैं कि हे प्रभु जी प्रभु की महिमा गाकर जीव काल से बच सकते हैं ।
.
मार काम मर मीच थैं, जन कूं राखै रांम ।
कहि जगजीवन नांउं ले, सब सूझै सब ठांम ॥५१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु काम से बचा कर जीव को रखते हैं । जो प्रभु का नाम लेते हैं उन्हें सब कुछ अनुभव होता है ।
.
कहि जगजीवन पुकारै, घड़ी घड़ी घडियाल ।
रांम सुमर तन ऊबरै, गाफिल५ ग्रसै काल ॥५२॥
{५. गाफिल=असावधान(बेपरवाह)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बार बार समय रुपी घण्टे ध्वनि हमें सावचेत कर रहे है । कि प्रभु स्मरण ही देह की श्रेष्ठ गति है । यदि बेपरवाह रहै तो काल के ग्रास बनोगे ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें