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*दादू अवसर चल गया, बरियां गई बिहाइ ।*
*कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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रांम बिन कौंण उबारै१ ॥
जाके सरणैं जाइये, सोई फिरि मारै रे ॥टेक॥
आप सुवारथ२ सब कहै, परमारथ नांहीं रे ।
साचौ अक्षिर३ जो कहै, तौ दूषै मांहीं रे ॥
जैसा नैं तैसौ४ मिलै, तोहि बणि आवै रे ॥
साहिबजी की जौ कहै, तौ पल न सुहावै रे ॥
गुर दादू नींकां कह्यौ, सो होइ न आवै रै५ ॥
टीला औसर चलि गयौ, प्रांणीं पछितावै रे६ ॥२०॥
(पाठान्तर : १. उबारै रे, २. सवारथ, ३. अषिर, ४. तैसा, ५. ‘रे’ नहीं है, ६. ‘रे’ नहीं है)
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इस दुस्तर भवसागर से रामजी के अतिरिक्त अन्य और कौन उबार सकता है । रामजी के अतिरिक्त अन्य जिसकी भी शरण का आश्रय लो, वही मारता है, डुबाता है किन्तु उबारता नहीं ॥टेक॥
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रामजी के अतिरिक्त अन्य सब अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत हैं । परमार्थी कोई नहीं है । यदि कोई ऐसे स्वार्थियों से उनकी यथार्थ प्रकृति को कह देता है तो वे अन्दर ही अन्दर दुखी होते हैं । कभी-कभी राग-द्वेष उत्पन्न होकर कलह-क्लेश भी होते देखे जाते हैं ।
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वस्तुतः जो जैसा होता है उसको वैसा ही अन्य मिल जाता है तो दोनों की आपस में बन जाती है, मित्रता हो जाती है । इसके विपरीत यदि कोई इन संसारियों से रामजी की बातें, रामजी का नामस्मरण करने की बातें कहता है तो वे इनको एक क्षण भी अच्छी नहीं लगती है ।
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गुरु महाराज दादूजी ने रामजी का नाम स्मरण करने के लिए खूब अच्छी तरह समझा-समझाकर कहा है किन्तु वह करने में आता नहीं है । टीला कहता है, भजन करने का अवसर चला जाता है तब प्राणी पश्चाताप करता है कि हाय ! मैं मनुष्य का शरीर पाकर भी रामजी का भजन नहीं कर सका । मैंने मेरा जीवन यों ही व्यर्थ में गँवा दिया जिसके कारण मुझे आज यम की यातनाओं को भुगतना पड़ रहा है ॥२०॥
(क्रमशः)

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