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*देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।*
*दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साक्षीभूत का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*येह जनैत मनौं नरसी जन१,*
*ना नरसी नरसी इन ध्यावै।*
*आन कहा यह बुद्धि गई वह,*
*साच करूँ हमहीं डहकावै ॥*
*येतहि आत सगाई करी द्विज,*
*मात नहीं तन बात सुनावै।*
*तो धन से इक फूस सरै नहिं,*
*देखहु ताल कुटा सु प्रभावै ॥३०९॥*
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यह बरात नरसी महता की है, यह सुनकर वे लोग परस्पर कहने लगे, यह भक्त१ नरसी को बारात तो नरों की सी बरात नहीं है। यह तो मानों देवताओं की सी बारात है। ऐसी बारात इस लोक में तो नरसी को मिल नहीं सकती किन्तु नरसी इनकी उपासना करता है। इससे ये देवता ही बारात में आये हैं।
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फिर वहाँ से लौटकर बेटी के पिता को उनने बारात की प्रशंसा सुनाई। सुनकर उसी की सुधबुध जाती रही। फिर उनकी बात में अविश्वास करके कहा- आप हमको बहकाते हैं या सत्य ही कह रहे हैं ?
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इतने में ही जो ब्राह्मण सगाई करने गया था वह आ गया और आनन्द से फूला हुआ अपने शरीर में भी नहीं समा रहा था। उसने सुनाया देखो, बारात कैसी विशाल और सुन्दर आई है।
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तुम्हारे धन से तो इस बारात के हाथी, अश्व, ऊँट और बैलों का घास भी पूरा नहीं पड़ेगा। अब ताल-कूटा का उत्तम प्रभाव तुम स्वयं अपने नेत्रों से देख लो, कैसा है ?
(क्रमशः)

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