शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ ११५*

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*सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।*
*दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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११५ गुरु उपकार । एक ताल
मेरे मंगल मन मांहि भये, दीरध दुख मेटे ।
अंग अंग अति उच्छाह, दादू गुरु भेंटे ॥टेक॥
पारस पग परसत१ ही, कचंन भई काया ।
फिर कलंक लागे नहीं, सदगुरु की छाया२ ॥१॥
शब्द डंक श्रवण लागि, कीट भृंग कीये ।
जन्म फेरि दुख निबेरि३, अपने संग लीये ॥२॥
दादू गुरु दृष्टि भानु४, आतम जल काढै ।
जन रज्जब धरती सौं, ले अकाश चाढै ॥३॥९॥
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गुरु देव का उपकार दिखा रहे हैं -
✦ गुरुदेव ने मेरे काम क्रोधादि जन्य बड़े बड़े दु:ख मिटा दिये हैं, अब मेरे हृदय में सब प्रकार मंगलाचार ही रहता है । जब से गुरु दादूजी मिले हैं, तबसे मेरे शरीर के प्रत्येक अंग में अति उत्साह रहता है ।

✦ जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुवर्ण हो जाता है, और फिर उसके मैल नहीं नहीं लगता, वैसे ही गुरुदेव के चरण स्पर्श१ से मेरा शरीर शुद्ध हो गया है और अब सदगुरु की शरण२ में रहने से पुन: कोई दोष नहीं लगता ।

✦ जैसे भृंग अपना डंक मार कर कीट को भृंग बना देता है, वैसे ही गुरुदेव ने शब्द सुनाकर हमारा जन्म बदल दिया है । दु:ख मिटाकर३ हमें अपने साथ ले लिया है, अर्थात अपने समान कर लिया है ।

✦ जैसे सूर्य की किरण जल को पृथ्वी से निकाल कर आकाश में चढा देती है, वैसे ही गुरु की ज्ञान दृष्टि ने हमारे जीवात्मा को संसार से निकाल कर ब्रह्म स्वरूप में स्थित किया है । यह गुरुदेव का महान उपकार है ।
(क्रमशः)

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