शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

*इन्द्रजाल*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*तुम हीं तातं तुम ही मातं,*
*तुम ही जातं, तुम्ह ही न्यातं ॥*
*कुल कुटुम्ब तूँ सब परिवारा,*
*दादू का तूँ तारणहारा ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १०७)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"श्रीराम से बचपन में बड़ा मेल था । दिनरात हम दोनों एक साथ रहते थे । एक साथ सोते थे । तब सोलह-सत्रह साल की उम्र थी । लोग कहते थे, इनमें से अगर एक औरत होता तो साथ ही विवाह भी हो जाता । उसके घर में हम दोनों खेलते थे । उस समय की सब बातें याद आ रही हैं । उनके सम्बन्धी पालकी पर चढ़कर आया करते थे, कहार 'हिजोड़ा हिजोड़ा' कहा करते थे ।
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"श्रीराम को देखने के लिए कितने ही बार मैंने बुला भेजा । अब चानक में उसने दूकान खोली है । उस दिन आया था, यहाँ दो दिन रहा था ।
'श्रीराम ने कहा, 'मेरे तो लड़के-बाले नहीं हुए, भतीजे को पालकर आदमी कर रहा था कि वह भी गुजर गया ।' कहते ही कहते श्रीराम ने लम्बी साँस छोड़ी, आँखों में पानी भर आया । भतीजे के लिए दुःख करने लगा ।
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"फिर उसने कहा, 'लड़का नहीं हुआ था, इसलिए स्त्री का पूरा प्यार उसी भतीजे पर पड़ा था । अब वह शोक से अधीर हो रही है । मैं उसे बहुत समझाता हूँ, पगली, अब शोक करने से क्या होगा ? तू वाराणसी जायेगी ?’
"अपनी स्त्री को वह पागल कहता था । भतीजे के लिए दुःख करने से वह एकदम dilute हो गया(गल गया) ।
"मैं उसे छू नहीं सका । देखा, उसमें कोई माद्दा(तत्त्व) नहीं है ।"
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श्रीरामकृष्ण शोक के सम्बन्ध में यही सब बातें कह रहे हैं । इधर कमरे के उत्तर ओरवाले दरवाजे के पास वह शोक-विह्वल ब्राह्मणी खड़ी हुई है । ब्राह्मणी विधवा है । उसके एक मात्र लड़की थी । उसका विवाह बहुत बड़े घराने में हुआ था । उस लड़की के पति राजा की उपाधि पाये हुए हैं ।
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कलकते में रहते हैं, जमींदार हैं । लड़की जब अपने मायके आती थी, तब साथ सशस्त्र सिपाही पालकी के आगे-पीछे लगे हुए आते थे । माता की छाती उस समय गज भर की हो जाती थी । वह एकलौती लड़की, कुछ दिन हुए, गुजर गयी है ।
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ब्राह्मणी खड़ी हुई भतीजे के वियोग से राम मल्लिक की क्या दशा थी, सुन रही थी । कई दिनों से वह लगातार बागबाजार से पागल की तरह श्रीरामकृष्ण के पास दौड़ी हुई आती थी, इसलिए कि अगर कोई उपाय हो जाय - अगर वे इस दुर्जेय शोक के निराकरण की कोई व्यवस्था कर दें ।
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श्रीरामकृष्ण फिर बातचीत करने लगे -
(ब्राह्मणी और भक्तों से) “एक आदमी यहाँ आया था । कुछ देर बैठने के बाद कहा, 'जाऊँ, जरा बच्चे का चाँदमुख भी देखूँ ?’
"तब मुझसे नहीं रहा गया । मैंने कहा, 'क्या कहा रे, उठ यहाँ से, ईश्वर के चाँदमुख से बढ़कर बच्चे का चाँदमुख ?’
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(मास्टर से) "बात यह है कि ईश्वर ही सत्य है और सब अनित्य जीव-जगत्, घर-द्वार, लड़के-बच्चे, यह सब बाजीगर का इन्द्रजाल है । बाजीगर डण्डे से ढोल पीटता है और कहता है, 'देख तमाशा मेरा - तू देख तमाशा मेरा ।' बस ढक्कन खोला नहीं कि कुछ पक्षी उसमें से निकलकर आकाश में उड़ गये । परन्तु बाजीगर ही सत्य है और सब अनित्य - अभी है, थोड़ी देर में गायब ।
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"कैलास में शिव बैठे हुए थे । पास ही नन्दी थे । उसी समय एक बहुत बड़ा शब्द हुआ । नन्दी ने पूछा, 'भगवन्, यह कैसी आवाज है ?’ शिव ने कहा, "रावण पैदा हुआ है, यह उसी की आवाज है । कुछ देर बाद फिर एक आवाज आयी । नन्दी ने पूछा, ‘यह कैसी आवाज है ?’ शिव ने हँसकर कहा, 'यह रावण मारा गया ।' जन्म और मृत्यु, यह सब इन्द्रजाल-सा है । अभी है, अभी गायब ! ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य ।
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पानी ही सत्य है, पानी के बुलबुले अभी हैं, अभी नहीं - बुलबुले पानी में ही मिल जाते हैं, - जिस जल से उनकी उत्पत्ति होती है, उसी जल में अन्त में वे लीन भी हो जाते हैं ।
"ईश्वर महासमुद्र हैं, जीव बुलबुले; उसी में पैदा होते हैं, उसी में लीन हो जाते हैं । लड़के-बच्चे एक बड़े बुलबुले के साथ मिले हुए कई छोटे छोटे बुलबुले हैं ।
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“ईश्वर ही सत्य है । उन पर कैसे भक्ति हो, उन्हें किस तरह प्राप्त किया जाय, इस समय यही चेष्टा करो । शोक करने से क्या होगा ?"
सब चुप हैं । ब्राह्मणी ने कहा, 'तो अब मैं जाऊँ ?’
श्रीरामकृष्ण (ब्राह्मणी से, सस्नेह) - तुम इस समय जाओगी ? धूप बहुत तेज है, क्यों इन लोगों के साथ गाड़ी पर जाना ।
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आज जेठ की संक्रान्ति है । दिन के तीन-चार बजे का समय होगा । गरमी बड़े जोर की पड़ रही है । एक भक्त श्रीरामकृष्ण के लिए चन्दन का एक नया पंखा लाये हैं । श्रीरामकृष्ण पंखा पाकर बड़े प्रसन्न हुए, कहा, "वाह-वाह । ॐ तत् सत् काली !'' यह कहकर पहले देवताओं को पंखा झलने लगे । फिर मास्टर से कह रहे हैं, "देखो, कैसी हवा आती है !’ मास्टर भी प्रसन्न होकर देख रहे हैं ।
(क्रमशः)

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