शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #२९१

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२९१)*
*अथ राग नट नारायण १८*
*(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*२९१. हित उपदेश । गजाताल*
*ताको काहे न प्राण संभालै ।*
*कोटि अपराध कल्प के लागे,*
*मांहि महूरत टालै ॥टेक॥*
*अनेक जन्म के बन्धन बाढ़े, बिन पावक फँध जालै ।*
*ऐसो है मन नाम हरी को, कबहूँ दुःख न सालै ॥*
*चिंतामणि जुगति सौं राखै, ज्यूं जननी सुत पालै ।*
*दादू देखु दया करै ऐसी, जन को जाल न रालै ॥*
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भा०दी०-हे प्राणिन् ! य: प्रभुराकल्पं कृतानि दुरितानि क्षणेनैव क्षपयति, तस्य प्रभोः प्रियनामानि किमर्थं त्वं न भजसि? यस्य नामसंकीर्तनेन कर्मबन्धनानि क्षीयन्ते, अग्नि विनैव भवबन्धनं भस्मीभवति । हे मानव ! त्वं किमपि मनसि विचारय, यद्भगवन्नाम्नि सर्वशक्तयः समाहिताः सन्ति । नहि भगवद्भक्तं किमपि दुःखं व्यथयितुमर्हति । मातेव भगवान् स्वप्रियभक्तान् रक्षति पालयति च । हरिनामचिन्तामणि-तुल्यं सर्वाशां पूरयति । पश्यतुतराम्, नहि प्रभु भक्तान् यमोऽपि दण्डयितुं ।
उक्तं हि भागवते-
न तस्य कश्चिद् दयित: सुहृत्तमो न चाप्रियो द्वेष्य उपेक्ष्य एव वा ।
तथापि भक्तान् भजते यथा तथा सुरद्रुमो यद् वदुपाश्रितोऽर्थदः ॥
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हे प्राणिन् ! जो प्रभु कल्पपर्यन्त किये हुए पापों को क्षण में ही नष्ट कर देता है, उस प्रभु के प्यारे नामों को किसलिये नहीं भजता ? उस भगवान् के नाम स्मरण मात्र से कर्म बन्धन कट जाते हैं । हे मानव ! तू जरा अपने मन में विचार तो कर, भगवान् के नामों में सारी शक्तियां निहित हैं ।
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भगवान् के भक्त को कोई भी दुःख दुःखी नहीं कर सकता । अपने प्यारे भक्तों की भगवान् माता की तरह रक्षा तथा पालन करते हैं । हरिनाम चिन्तामणि के तुल्य है । संकल्प मात्र से ही क्षण भर में ही सब कुछ देने में समर्थ हैं । सब की आशाओं को पूर्ण करता है । जरा देख, प्रभु भक्तों को यमराज भी दण्ड नहीं दे सकता ।
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भागवत में लिखा है कि –
न तो भगवान् का कोई प्रिय है एवं न अप्रिय, न कोई आत्मीय सुहृद् है, न कोई शत्रु है, न कोई उपेक्षा का पात्र है । फिर भी कल्प-वृक्ष जैसे अपने निकट आकर मांगने वाले को उनकी मुंहमांगी वस्तु देता है वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण भी, जो उन्हें जिस प्रकार से भजता है, उसे उसी रूप में भजते हैं ।
(क्रमशः)

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