शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

*पाषंड परपंच सूं मन लायौ*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#संतटीलापदावली* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।*
*पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥*
=================
*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
===========
एक अंदेसौ मन मैं रह्यौ ।
मनसा बाचा रांम न कह्यौ ॥टेक॥
पाषंड परपंच सूं१ मन लायौ ।
साचौ रांम न कबहूँ गायौ२ ॥
लालच लोभ मोह भरपूरि ।
निरमल नांव रह्यौ यूँ३ दूरि ॥
गुर दादू किरपा थैं जीजै ।
टीला राम रसांयन४ पीजै ॥१९॥
(पाठान्तर : १. सौं, २. साचा राम कबहु नहिं गायौ, ३. यौं, ४.रसाइन ।)
.
मन में एक अन्देसा=संशय रह ही गया कि रामभजन करना श्रेष्ठ है अथवा संसारी की तरह संसार में रहकर बर्ताव करना श्रेष्ठ है । इसी गफलत के कारण मनसा-वाचा-कर्मणा रामजी के नाम का स्मरण नहीं किया ॥टेक॥
.
पाखंड=मिथ्याचार तथा परपंच=झूठ-कपट में ही मन को सदैव लगाकर रखा । सत्य-सनातन-रामजी का स्मरण कभी भी नहीं किया ।
.
मन लालच-लोभ-मोह आदि से ही सदैव परिपूर्ण रहा, परिणामस्वरूप निर्मल नाम को कभी भी हृदय में धारण नहीं कर सका अथवा परिणामस्वरूप मन को निर्मल कर देने वाला भगवन्नाम मेरे से साधित होने से सर्वथा दूर ही रह गया ।
.
टीला कहता है, गुरुमहाराज दादूजी की कृपा से रामजी के नाम रूपी रसायन का सदैव पान करो और मरने से बचकर हमेशा-हमेशा के लिए जीवित रह जावो । मुक्ति हो जाने पर आवागमन का चक्र मिट जाता है । आत्मा स्वयं के अंशी स्वरूप परब्रह्म-परमात्मा से अभिन्न होकर सत्य-सनातन हो जाता है ॥१९॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें