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*पहली श्रवण द्वितीय रसना, तृतीय हिरदै गाइ ।*
*चतुर्दशी चेतन भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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११० भजन भेद । शूल ताल
एक नाम भजिबे१ में भेद, कोई इक पावै संत न खेद ।
जो ज्यों भजे तिहीं त्यों होय, महल२ महल का हासिल३ जोय ॥टेक॥
प्रथम नाम भजै संसार, कर माला काती४ संग लार५ ।
मन में नहीं इकतार६, तो इहै७ नाम मृतक व्यवहार ॥१॥
दूजे महल नाम की आश, भजबे लागा श्वासे श्वास ।
अंतर८ ऊंध९ उठै सब ओर, अह निशि लाग रहे निज ठौर ॥२॥
तीजे महल पंच शर पूर, पंच स्वभाव काढ दे दूर ।
जब उपजे अन्तर यह मांहीं, तब पहुंचे संशय कछु नांहीं ॥३॥
चौथे महल जाय जब लेय, नौसे ऊलट नाम में देय ।
नौ निधि निपज रहे तन मांहिं, तब प्राणी के दारिद जांहिं ॥४॥
पूरे महल पंच परि जाय, रोम रोम रट राम अघाय१० ।
जन रज्जब युग युग यह ठाट११, सदगुरु कही नाम निज बाट१२ ॥५॥४॥
नाम भजन की अवस्थायें बता रहे हैं -
✦ नाम तो एक ही है किंतु उसके भजन१ की अवस्थाओं का भेद रहता है, उस भेद रूप रहस्य को कोई विरला संत ही जान पाता है और जो जान जाता है उसे संसार दुख नहीं होता । जो जिस जिस अवस्था२ में जैसे जैसे भजन भजता है, उसे उस उस अवस्था का वैसा वैसा ही फल प्राप्त३ होता है ।
✦ जो संसार के प्राणी हाथ में माला और साथ में उसके पीछे५ धोखा रूप छुरी४ रखकर नाम को भजते हैं, वह नाम भजन की प्रथम अवस्था है । जब तक मन में अद्वैत ब्रह्म का चिन्तन निरंतर६ नहीं होता, तब तक यह७ नाम चिंतन मृतक व्यवहार के समान है अर्थात लाभ रहित है ।
✦ भजन की दूसरी अवस्था में नाम भजन कि आशा लगी रहती है और प्रति श्वास में भजन करने लगता है । भीतर की तंद्रा९ तथा और भी सब विघ्न८ हृदय से उठ जाते हैं । रात्रि दिन वृति निज स्थान रूप परब्रह्म के स्वरूप में लगी रहती है ।
✦ भजन की तीसरी अवस्था में काम के पंच बाण हृदय में पूर्ण रूप से लगने लगते हैं । जब उन पंच बाण रूप पंच स्वभावों को और उनसे मन में उत्पन्न होने वाले अन्य अंतरायों के हृदय से निकल कर दूर करता है । तब समझना चाहिये, यह प्रभु के पास पहुँचेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।
✦ भजन की चौथी अवस्था में जाता है तब नौ सौ नाड़ियों को उलट कर नाम में लगाने की शक्ति प्राप्त करता है अर्थात प्रत्येक नाड़ी से नाम ध्वनि होने लगती है और शरीर के भीतर नवधाभक्ति रूप नौ निधि उत्पन्न हो जाती है तब प्राणी की आशा रूप दरिद्रता नष्ट हो जाती है ।
✦ पूरे साधक संत ही भजन की पंचमावस्था में जाते हैं और रोम रोम में राम नाम का चिंतन करते हुये तृप्त१० हो जाते हैं । सदगुरु के कहे हुये इस नाम चिंतन रूप मार्ग१२ में चलने से प्रति युग में आनन्द११ ही रहता है ।
(क्रमशः)

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