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*सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ ।*
*आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०९ गुरु संसार विवेक । झपताल
ऐसे गुरु संसार यह, सुन समझ विचारा ।
जे चाहै उपदेश को, तो पूछ१ पसारा२ ॥टेक॥
चौरासी लख जीव का, लक्षण ले मांही ।
मया मिल मर ही गये, पर मेले३ नांहीं ॥१॥
अचल मता४ उर लीजिये, गिरी तरुवर ताकी५ ।
जहां रोपे तहँ रह गये, सुन सदगुरु साखी ॥२॥
चन्द सूर पाणी पवन, धरणी आकाशा ।
रज्जब समता पूछले, षट् दर्शन पासा ॥३॥३॥
गुरु और संसार के विवेक पूर्वक अचल मत ग्रहण करने की प्रेरणा कर रहे हैं -
✦ यह संसार ऐसा है और गुरु ऐसा है इस विचार को संतों से सुनकर समझ और ब्रह्म प्राप्ति संबन्धी उपदेश चाहता है तो संसार विस्तार२ को हृदय से दूर१ कर ।
✦ जो चौरासी लाख योनियों के जीवॊं के स्वभाव रूप लक्षण अपने हृदय में धारण करके माया से मिले हैं, वे तो पच पच कर मर ही गये हैं किंतु प्रभु से नहीं मिल३ सके हैं ।
✦ प्रभु को प्राप्त करने के लिये पर्वत और वृक्षों की अचलता की और देखते५ हुये अपने हृदय में अचल विचार४ लाओ । जैसे पर्वत और वृक्षों को जहाँ रोप दिया है वे वहाँ ही रह गये हैं । वहां से हटते नहीं । वैसे ही सदगुरु की साक्षी सुनकर जहां वे लगावे वहां ही दृढ़ता से लग जाना चाहिये ।
✦ छह प्रकार के भेषों के आधार - चन्द्रमा, सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश इन छह से समता संबन्धी विचार पूछ कर अर्थात इनकी समता देखकर ही समता धारण करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

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