शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

*श्रीरामकृष्ण तथा अहंकार का त्याग*

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*दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।*
*परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद ११६~*श्रीरामकृष्ण तथा अहंकार का त्याग*
*(१)श्रीरामकृष्ण की ज्ञान तथा भक्ति की अवस्था*
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श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में उसी परिचित कमरे में विश्राम कर रहे हैं । आज शनिवार है, १३ जून १८८५, जेठ की शुक्ला प्रतिपदा; जेठ की संक्रान्ति । दिन के तीन बजे होंगे । श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद तखत पर जरा विश्राम कर रहे हैं ।
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एक पण्डितजी जमीन पर चटाई पर बैठे हुए हैं । शोक से विह्वल एक ब्राह्मणी कमरे के उत्तर तरफवाले दरवाजे के पास खड़ी हुई है । किशोरी भी हैं । मास्टर ने आकर प्रणाम किया । साथ में द्विज आदि हैं । अखिलबाबू के पड़ोसी भी बैठे हुए हैं । उनके साथ आसाम का एक लड़का अभी पहले-पहल आया हुआ है ।
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श्रीरामकृष्ण कुछ अस्वस्थ हैं । गले में गिलटी पड़ गयी है, कुछ जुकाम भी हो गया है । उनकी गले की बीमारी बस यहीं से शुरू होती है ।
अधिक गरमी पड़ने के कारण मास्टर का भी शरीर अस्वस्थ रहता है । श्रीरामकृष्ण के दर्शन के लिए वे इधर लगातार दक्षिणेश्वर नहीं आ सके ।
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श्रीरामकृष्ण - यह लो तुम तो आ गये । तुमने जो बेल भेजा था वह बड़ा अच्छा था । तुम कैसे हो ?
मास्टर - जी, पहले से अब कुछ अच्छा हूँ ।
श्रीरामकृष्ण - बड़ी गरमी पड़ रही है । कुछ कुछ बर्फ खाया करो ।
"गरमी से मुझे भी बड़ा कष्ट हो रहा है । गरमी में कुलफी बर्फ - यह सब बहुत खाया गया । इसीलिए गले में गिलटी पड़ गयी है । गले से बड़ी बदबू निकल रही है ।
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"माँ से मैंने कहा, अच्छा कर दो, अब कुलफी बर्फ न खाऊँगा ।
"इसके बाद यह भी कहा है कि बर्फ न खाऊँगा ।
"माँ से जब कह दिया है कि अब न खाऊँगा तो खाना अवश्य ही न होगा । परन्तु एकाएक भूल भी ऐसी हो जाती है ।
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"परन्तु जानते में भूल नहीं होने पाती । उस दिन गडुआ लेकर एक आदमी को झाऊतल्ले की ओर आने के लिए मैंने कहा । उस समय वह जंगल गया था, इसलिए एक दूसरा आदमी ले आया । मैंने जंगल से आकर देखा, एक दूसरा ही आदमी गडुआ लिए हुए खड़ा था । अब क्या करूँ ? हाथ में मिट्टी लगाये खड़ा रहा जब तक उसी ने आकर पानी नहीं दिया ।
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"माता के पादपद्मों में फूल चढ़ाकर जब मैं सब कुछ त्याग करने लगा तब कहा, 'माँ, यह लो अपनी शुचिता और यह लो अशुचिता; यह लो अपना धर्म और यह लो अधर्म; यह लो अपना पाप और यह लो पुण्य; यह लो अपना भला और यह लो बुरा, - मुझे शुद्धा भक्ति दो ।' परन्तु यह लो अपना सत्य और यह अपना असत्य, यह मैं नहीं कह सका !"
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एक भक्त बर्फ ले आये हैं । श्रीरामकृष्ण बार बार मास्टर से पूछ रहे हैं 'क्यों जी, क्या खा लूँ ?’
मास्टर ने विनयपूर्वक कहा, 'तो आप माँ की आज्ञा बिना लिये न खाइये ।' श्रीरामकृष्ण ने अन्त में बर्फ नहीं खायी ।
(क्रमशः)

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