रविवार, 5 फ़रवरी 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #२९२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२९२)*
*राग नट नारायण १८*
*(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
.
*२९२. विरह । जय मंगल ताल*
*गोविन्द कबहुँ मिलै पीव मेरा ।*
*चरण-कमल क्योंहीं कर देखूं, राखूं नैनहुँ नेरा ॥टेक॥*
*निरखण का मोहि चाव घणेरा, कब मुख देखूं तेरा ।*
*प्राण मिलन को भई उदासी, मिल तूँ मीत सवेरा ॥१॥*
*व्याकुल तातैं भई तन देही, सिर पर जम का हेरा ।*
*दादू रे जन राम मिलन को, तपहि तन बहुतेरा ॥२॥*
.
भा०दी०-हे गोविन्द ! त्वं कदा प्राप्स्यसि ? कथं वा तव दर्शनं कृत्वा तव चरणकमलेनेत्रयोः यावें धारयिष्यामि । तव मुखारविन्दं दृष्टुं मम मनसि महोत्साहे वर्तते । हा हा नाथ ! नाहं वक्तुं समर्थोऽस्मि कदा तव दर्शनं स्यादिति । मम मनस्तु त्वदर्शनार्थं त्वरते । शिरसि स्थितो यमो मां प्रहरति, स्थूल-शरीरे स्थितोऽपि जीवात्मा त्वदर्थ व्याकुलोऽस्ति । हा हा ! तव भक्तस्य शरीरं मनश्च प्रभुं द्रुष्टुं संतप्ते स्त: । अतो हे मित्र ! शीघ्रं दर्शय ।
.
उक्तं हि श्रीमद्भागवते-
तं त्वद्य नूनं महतां गतिं गुरुं त्रैलोक्यकान्तं दृशिमन्महोत्सवम् ।
रूपं दधानं श्रिय ईप्सितास्पदं द्रक्ष्ये ममासन्नुषस: सुदर्शनाः ॥
.
हे गोविन्द ! आप कब मिलेंगे और कब आपका दर्शन करके चरण-कमलों को मेरे नेत्रों के पास रख सकूंगा ? आपके मुखारविन्द का दर्शन करने के लिये मेरे मन में बड़ा ही उत्साह हो रहा है । हे नाथ ! मैं तो यह निश्चित नहीं कह सकता कि आपके दर्शन मुझे कब होंगे ? मेरा मन तो आपके दर्शनों के लिये दुःखी हो रहा है ।
.
शिर पर खड़ा यम भी मुझे मार रहा है । इस स्थूल शरीर में रहने वाला जीवात्मा भी आपके दर्शनों के लिये व्याकुल हो रहा है । हा ! हा ! नाथ आपके भक्त का मन और शरीर प्रभु को देखने के लिये संतप्त हो रहे हैं । इसलिये हे मित्र ! जल्दी दर्शन देवो ।
.
भागवत में –
इसमें संदेह नहीं है कि आज मैं अवश्य ही उन्हें देखूंगा । वे बड़े बड़े सन्तों और लोक पालों के एकमात्र आश्रय हैं । सबके परमगुरु हैं और उनका रूप सौन्दर्य तीनों लोकों के मन को मोहित करने वाला है । जो नेत्र वाले हैं, उनके लिये वह आनन्द और रस की चरम सीमा है ।
.
इसी से स्वयं लक्ष्मीजी के मन में भी, जो सौन्दर्य की अधीश्वरी हैं, उन्हें पाने के लिये लालसा बनी ही रहती है । हां, तो मैं उन्हें अवश्य देखूंगा क्योंकि आज मेरा मंगल प्रभात है । आज मुझे प्रातःकाल से ही अच्छे शकुन दिख रहे हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें