शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

*नित्यानन्द प्रभु की पद्य टीका*

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*लाग रह्यो मन राम सौं, अब अनतैं नहिं जाये रे ।*
*अचला सौं थिर ह्वै रह्यो, सकै न चित्त डुलाये रे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ४१५)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नित्यानन्द प्रभु की पद्य टीका*
*इन्दव- आप सदा मदमत्त रहे,*
*बलदेव चहै पुनि प्रेम मताई१ ।*
*वे हि नित्यानंद रूप धर्यो प्रभु,*
*आई भरी तु२ उहै३ चित चाई४ ॥*
*भार भयो न संभार शरीर हु,*
*पारषदों महि राखि धराई।*
*कैत५ हु तें सुन कान घरे जन,*
*होय गई मतवारि सभाई ॥३११॥*
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प्रथम द्वापर में आप कृष्ण के बड़े भाई बलरामजी थे। उस समय वारुणी पान करके मत्त रहते थे। किन्तु फिर बलरामजी ने चाहा कि अब मैं प्रेम की मत्तता१ का भी अनुभव करूं।
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इसलिये वे बलरामजी ही कलियुग में श्रीनित्यानन्द प्रभु का रूप धारण करके आये और संपूर्ण प्रेम मत्तता लेकर अपने हृदय में भर ली। तो२ भी आपको उस३ प्रेम की अभिलाषा४ बनी ही रही।
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आपको उस प्रेम मादकता का ऐसा भारी बोझा हुआ कि किसी प्रकार भी उसको शरीर सँभाल न सका वा उसके कारण शरीर की भी संभाल नहीं रह सकी। तब कृपा करके अपने शिष्य रूप पार्षदों में थोड़ा थोड़ा रख के उसे पृथ्वी पर धरा अर्थात् प्रचार किया।
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उस प्रेम माधुरी के कहते कहते५ और सुनते सुनते भक्तों की सभा प्रेम में मतवाली हो जाती थी ॥
(क्रमशः)

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