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*अपणो जान करै प्रतिपाला,*
*नैन निकट उर धरै गोपाला ॥*
*दादू कहै नहीं वश मेरा,*
*तूँ माता मैं बालक तेरा ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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जै अपराधी तौ हूं१ थारौ ।
सकल सिरोमणि तूं साहिब२ म्हारौ ॥टेक॥
सुत औगुण केता हीं करै ।
पुत्र दुषी तौ माता मरै ।
सुत सोवै कहीं आवै न जाइ ।
माता दे तौ बालक खाइ ॥
माता काज कितौ३ ही करै ।
चित वाहि बालिक मांहैं रहै ।
टीलौ सुत माता तूं रांम ।
अब अैसी बिधि कीज्यौ काम ॥२४॥
(पाठान्तर : १. हौं, २. सांई, ३. पिता)
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यदि अपराधी हूँ तब भी मैं तेरा हूँ । हे सर्वशिरोमणि ! तू ही मेरा स्वामी है ॥टेक॥
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पुत्र चाहे कितने ही अवगुण=अपराध क्यों न करे तब भी उस अवगुणी पुत्र के दुःखी होने पर माता परमदुखी होती है, कभी-कभी पुत्र के दुःखों से दुःखी होकर मर भी जाती है । माता जहाँ सुलाती है, पुत्र वहीँ सोया रहता है । अपने प्रयत्नों से न कहीं जाता है और न कहीं से आता है । माता खिलाती-पिलाती है तो बालक खाता-पीता है । कहने का आशय है, पुत्र सर्वतोभावेन माता पर निर्भर रहता है और माता पुत्र के सर्व योगक्षेम का वहन करती है ।
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माता घर के कार्य कितना ही दत्तचित्त होकर करे फिर भी उसकी चित्तवृत्ति बालक में ही रहती है । टीला कहता है, मैं आपका पुत्र और हे रामजी ! आप मेरी माता हैं । अब ऐसा सम्बन्ध मानकर ही मेरा काम कर दीजिए । मुझे आपका साक्षात्कार प्रदान कर संसार में आवागमन के चक्र से मुक्त कर दो ॥२४॥
(क्रमशः)

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