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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ५३/५६*
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इंद्रिय निमित अचेत नर, कांई जगावै काल ।
कहि जगजीवन रांम पिछांणै, परिहरि माया जाल ॥५३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इन्द्रिय वशीभूत हो जीव भोगों में बेहोश रहता है । उसे काल कैसे जगाये कि सुकृत करो । जब जीव प्रभु को जान जाता है तभी वह माया का जाल छोड़ पाता है ।
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जगजीवन ये माल धन, जीव चल्या सब छोड़ि ।
जहां तहां ये सब रह्या, जोड्या लाख करोड़ि ॥५४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव जब पलायन करता है तो सब माल धन यहां ही रह जाता है । उसके लाख करोड़ जोड़े हुये भी यही रह जाते हैं ।
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जगजीवन नर नींच६ कूं, कहि क्यों छांडै मींच७ ।
गलै भरम की जेवड़ी८, मरकट९ की सी खींच ॥५५॥
(६. नींच=हीन, पापी) (७. मींच=मृत्यु) (८.जेवड़ी=रस्सी) (९. मरकट=बन्दर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मनुष्य जब निम्न कर्म करें तो मृत्यु उसे कैसे छोड़ देगी । उसके गले में तो मदारी के बंदर सी डोरी हे जिसे जब चाहे काल अपनी और खींच ले ।
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रांम बिमुख नर रहणी१ बैणी२, परगट रहै ना गोपि३ ।
जगजीवन क्यूं ऊबरै, काल बढै तहँ कोपि४ ॥५६॥
(१. रहणी=जीवनचर्या) {२. वैणी=वाणी(वचन)} {३. गोपि=गुप्त(छिपी हुई)} ४. (कोपि=क्रुद्ध)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम के बिना जो दिनचर्या है । उनकी वाणी न तो छिपी रहती है न प्रकट है । जहाँ काल का कुपित हो वहां कोइ कैसे उबर सकता है ।
(क्रमशः)

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