बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

*नांनां भेष बरन बहु कीन्हां*

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*दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह ।*
*सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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धनि परमेसुर धनि परमेसुर ।
ब्रह्मा विष्न किये जिनि ईस्वर ॥टेक॥
गैब मांहि१ थैं२ प्यंड उपाया ।
जीव दिया सब धंधै लाया ॥
सिध साधिक किये सब आप ।
लिपै नहीं ताहि पुंन्यं३ न पाप ॥
चंद सूर दोइ दीपक लाया ।
धरनि गगन जिनि पवन चलाया ।
नांनां भेष बरन बहु कीन्हां ।
करि प्रतिपाल सबै सुष दीन्हां ॥
गुर दादू किरपा थैं सूझै ।
टीला हरि गुण बिरला बूझै ॥२१॥
(पाठान्तर : १. मांह, २. तैं, ३. पुंनि)
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पदकार ब्रह्म को जगत्सृष्टा बताते हुए कहते हैं, परब्रह्म-परमात्मा-परमेश्वर को धन्यवाद है, धन्यवाद है जिसने ब्रह्मा, विष्णु और ईश्वर=शिव को सृष्टि के निर्माण, पालन व ध्वंश के लिए बनाया ॥टेक॥
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गैव=स्वयं में ही उसने प्यंड=शरीर को बनाया । उस शरीर में जीव को स्थापित कर उसे चैतन्य किया और काम-धँधे में लगाया । सिद्ध, साधक आदि सभी को भी उसी ने बनाया । फिर भी वह न पुण्य और न पाप में ही लिपायमान होता है । सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता है क्योंकि वह राग-द्वेष-वृत्ति से रहित हुआ निर्लिप्त भाव से सब कुछ करता है ।
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सृष्टि के सुचारू संचालन के लिए उसने सूर्य और चन्द्रमा नामक प्रकाशकर्ता दो दीपकों को बनाया । भूमि और आकाश को बनाया । जीने के लिए पवन को चलाया । अनेक वेश=शरीर और वर्ण = जातियों(स्वेदज, अंडज, अद्भिज और जरायुज नामक चार प्रकार की सृष्टि) को बनाया । सभी का प्रतिपालन करके सुख देता है । टीला कहता है, गुरुमहाराज दादूजी की कृपा से यह रहस्य सभी जो उनके संपर्क में आए हैं को मालुम हुआ है । ऐसे परात्पर-परब्रह्म-हरि के गुणों का कथन कोई विरला ही करता है ॥२१॥
(क्रमशः)

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