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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ६१/६४*
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*जंबुक१२ को बाह्यौ बह्यौ, करै कुसंगति जाइ ।
कहि जगजीवन रांम तजि, खर१३ ज्यूं बूडै आइ* ॥६१॥
{१२. जम्बूक=शृगाल(गीदड़)} {१३.खर=मूर्ख(अविवेकी,गधा)}
(*-*. इस साखी से पंचतन्त्र ग्रन्थ के मित्रभेद प्रकरण की और महात्मा का संकेत है ॥६१॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि गीदड़ कि बातो में बहकर कुसंग में फंसकर जैसे गधा डूब गया था वैसे ही जीव भी कुसंग से पतनगामी होता है ।
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लख चउरासी जूंण महिं१४, पहलै रह्या समाइ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मंहि बोलै आइ ॥६२॥
(१४. लखचउरासी जूंण महिं=चौरासी लाख योनियों के बीच)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों से जीव गुजरता है । किंतु जो प्रभु के भक्त हैं वे सदा प्रभु नाम जपते रहते हैं ।
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उतपति परलै१५ देखि करि, अंति मन भयौ उदास ।
जगजीवन इक रांम बिन, यहु जग झूंठी आस ॥६३॥
(१५. परलै=प्रलय, नाश)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उत्पत्ति प्रलय को देखकर यह मन अंत में उदास हो जाता है । संत कहते हैं कि एक प्रभु के नाम के बिना इस संसार की सभी आशायें झूंठी है ।
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उतपति छाया बिलावै. ज्यों वोला१६ बिच नीर ।
कहि जगजीवन रांमजी, अलख निरंजन थीर ॥६४॥
{१६. वोला=ओला(बर्फ के टुकड़े)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव उत्पन्न हुआ है उसका आभास भी होता है जैसे ओले कितने ही कठोर हो उनमें जल का आभास रहता है । ऐसे ही प्रभु भी सब जीवों में स्थिर है ।
(क्रमशः)

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