रविवार, 19 फ़रवरी 2023

*दास 'मैं' । अवतारवाद*

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*परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(३)दास 'मैं' । अवतारवाद*
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बच्चे को साथ लेकर कप्तान आये हैं । श्रीरामकृष्ण ने किशोरी से कहा, इन्हें सब दिखा लाओ - ठाकुरबाड़ी आदि ।
श्रीरामकृष्ण कप्तान से बातचीत कर रहे हैं । मास्टर, द्विज आदि भक्त जमीन पर बैठे हुए हैं । दमदम के मास्टर भी आये हैं । श्रीरामकृष्ण छोटे तखत पर उत्तर की ओर मुँह किये बैठे हैं । कप्तान से उन्होंने तखत के एक ओर अपने सामने बैठने के लिए कहा ।
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श्रीरामकृष्ण - इन लोगों से तुम्हारी बातें कह रहा था । तुममें कितनी भक्ति है, कितनी पूजा करते हो, कितने प्रकार से आरती करते हो, यह सब बतला रहा था ।
कप्तान (लज्जित होकर) - मैं क्या पूजा और आरती करूँगा ? मैं क्या हूँ ?
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श्रीरामकृष्ण - जो 'मैं' कामिनी और कांचन में पड़ा हुआ है, उसी 'मैं' में दोष है । मैं ईश्वर का दास हूँ, इस 'मैं' में दोष नहीं । और बालक का 'मैं' - बालक किसी गुण के वश नहीं है; अभी लड़ाई कर रहा है, देखते-देखते, मेल हो गया । कितने ही यत्न से अभी अभी खेलने का घरौंदा बनाया, फिर बात की बात में उसे बिगाड़ डाला !
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दास 'मैं' और बच्चे के 'मैं' में दोष नहीं है । यह 'मैं' 'मैं' में नहीं गिना जाता, जैसे मिश्री मिठाई में नहीं गिनी जाती - दूसरी मिठाई से बीमारी फैलती है, परन्तु मिश्री अम्लनाश करती है - जैसे ओंकार की गणना शब्दों में नहीं है ।
"इस अहं से ही सच्चिदानन्द को प्यार किया जाता है ।
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अहं जाने का है ही नहीं - इसीलिए दास 'मैं' और भक्त का 'मैं' है । नहीं तो आदमी क्या लेकर रहे ? गोपियों का प्रेम कितना गहरा था ! (कप्तान से) तुम गोपियों की बात कुछ कहो - तुम इतना भागवत पढ़ते हो ।"
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कप्तान - श्रीकृष्ण वृन्दावन में थे, कोई ऐश्वर्य नहीं था, तो भी गोपियाँ उन्हें प्राणों से अधिक प्यार करती थीं । इसीलिए श्रीकृष्ण ने कहा था, 'मैं कैसे उनका ऋण शोध करूँगा, जिन गोपियों ने मुझे सब कुछ समर्पित कर दिया है - देह, मन, चित्त ?'
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श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो रहा है । 'गोविन्द, गोविन्द, गोविन्द' कहकर भावाविष्ट हो रहे हैं । प्रायः ब्राह्यज्ञान-शून्य हैं । कप्तान विस्मयावेश में 'धन्य है, धन्य है' कह रहे हैं ।
कप्तान तथा अन्य भक्तगण श्रीरामकृष्ण की यह अद्भुत प्रेमावस्था देख रहे हैं । जब तक वे प्राकृत दशा में न आ जायँ, तब तक वे चुपचाप एकदृष्टि से देख रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - इसके बाद ?
कप्तान - वे योगियों के लिए भी अगम्य हैं, 'योगिभिरगम्यम्' । आपकी तरह योगियों के लिए भी अगम्य हैं, गोपियों के लिए गम्य हैं । योगियों ने वर्षों तक योग-साधना करके जिन्हें नहीं पाया, गोपियों ने अनायास ही उन्हें प्राप्त कर लिया ।
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - गोपियों के पास भोजन-पान, हँसना-रोना, क्रीड़ा कौतुक, यह सब हो चुका ।
एक भक्त ने कहा, 'श्रीयुत बंकिम ने कृष्ण-चरित्र लिखा है ।'
श्रीरामकृष्ण - बंकिम कृष्ण को मानता है, श्रीमती को नहीं मानता ।
कप्तान - वे शायद श्रीकृष्ण-लीला नहीं मानते ।
श्रीरामकृष्ण - सुना, वह कहता है, काम आदि की जरूरत है !
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दमदम के मास्टर - 'नवजीवन' में बंकिम ने लिखा है, धर्म की आवश्यकता शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक प्रवृत्तियों की स्फूर्ति के लिए है ।
कप्तान - 'कामादि की आवश्यकता है' - यह कहते हैं, फिर भी लीला नहीं मानते ! ईश्वर मनुष्य के रूप में वृन्दावन में आये थे, पर राधा और कृष्ण की लीला हुई थी यह नहीं मानते ?
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - ये सब बातें संवाद-पत्रों में नहीं हैं, फिर किस तरह मान ली जायँ ?
"एक ने अपने मित्र से आकर कहा, 'देखो जी, कल उस मुहल्ले से मैं जा रहा था, उसी समय देखा, वह मकान भरभराकर गिर गया ।' मित्र ने कहा, 'जरा ठहरो, अखबार देखूँ ।' घर के भरभराकर गिरने की बात अखबार में तो कहीं कुछ न थी । तब उस आदमी ने कहा, 'क्यों जी अखबार में तो कहीं कुछ नहीं लिखा । तुम्हारा कहना सच नहीं दिखता ।' उस आदमी ने कहा, 'मैं स्वयं देखकर आ रहा हूँ ।' उसने कहा, 'यह हो सकता है, परन्तु अखबार में यह बात नहीं लिखी, इसलिए लाचार होकर मुझे इस पर विश्वास नहीं आता ।'
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ईश्वर आदमी होकर लीला करते हैं, यह बात कैसे वे लोग मानेंगे ? यह बात उनकी अंग्रेजी शिक्षा के घेरे में नहीं जो है ! पूर्ण अवतार का समझाना बहुत मुश्किल है, क्यों जी ? साढ़े तीन हाथ के भीतर अनन्त का समा जाना ?"
कप्तान - 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' कहते समय पूर्ण और अंश इस तरह कहना पड़ता है ।
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श्रीरामकृष्ण - पूर्ण और अंश, जैसे अग्नि और उसका स्फुलिंग । अवतार भक्तों के लिए हैं - ज्ञानी के लिए नहीं । अध्यात्मरामायण में है, 'हे राम ! तुम्हीं व्याप्य हो, तुम्हीं व्यापक हो' - 'वाच्यवाचकभेदेन त्वमेव परमेश्वर ।’ कप्तान – वाच्य-वाचक अर्थात् व्याप्य-व्यापक ।
श्रीरामकृष्ण - व्यापक अर्थात जैसे एक छोटासा रूप - जैसे अवतार आदमी का रूप धारण करते हैं ।
(क्रमशः)

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